आठवीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा चमोली जिले के सलूड़ डुंग्रा गांव में शुरू कराया गया रामायण का मंचन आज भी उसी शैली में होता है।
रम्माण नाम से जानी जाने वाली इस मंचन शैली को विश्वधरोहर का दर्जा हासिल है। मंचन को करीब से देखना है तो 30 अप्रैल को सलूड़ डुंग्रा गांव में आयोजित होने वाले रम्माण मेले में आना न भूलें।
मेले की शुरुआत
मान्यता है कि जब 8वीं शताब्दी में 12 वर्ष की उम्र में आदि गुरु शंकराचार्य हिमालय क्षेत्र की ओर आए तो उन्होंने बदरीकाश्रम क्षेत्र में हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए राम कथाएं, रामलीलाएं और अन्य धार्मिक आयोजन कराए।
इस दौरान भोजपत्र के मुखौटे पहनकर सूर्य भगवान, कालिंका शक्ति, गणेश आदि देवों का मंचन करने वाले लोगों द्वारा नृत्य और जागर गाए जाते हैं।
इसके पश्चात अंत में रम्माण (रामायण) का मंचन किया जाता है। इसमें भगवान राम के जन्म से लेकर राम-रावण युद्ध और राम के राज्याभिषेक तक के मंचन को नृत्य और जागर के माध्यम से दिखाया जाता है।
8वीं सदी के मुखौटों के अवशेष आज भी जोशीमठ में स्थित नृसिंह मंदिर के भंडार गृह में मौजूद हैं।
ऐसे मिली विश्व धरोहर की उपाधि
पूर्व निदेशक लोक कला संस्कृति एवं निष्पादन केंद्र गढ़वाल विवि डा. डीआर पुरोहित और रम्माण मेला संयोजक डा. कुशल भंडारी के नेतृत्व में जनवरी 2008 में दिल्ली में रम्माण का आयोजन किया गया।
डेढ़ घंटे के इस कार्यक्रम को खूब साहा गया। परिणाम यह हुआ कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली की 30 सदस्यीय टीम अप्रैल 2008 को मेले के दौरान चमोली के सलूड़ डुंग्रा गांव पहुंची।
मेले का अभिलेखीकरण (डाक्यूमेंटेशन) कर इसकी रिपोर्ट यूनेस्को भेजी। यूनेस्को ने मेले की पौराणिकता और कला आदि पहलुओं का अध्ययन करने के पश्चात 2 अक्तूबर 2009 को इस मेले को विश्व धरोहर घोषित किया।
रम्माण मेले को पर्यटन से भी जोड़ा जा रहा है। इस आयोजन के लिए जिला स्तरीय कमेटी भी गठित की जा रही है। चार धाम यात्रा और लोक सभा चुनाव प्रक्रिया के कारण मेले पर कोई असर नहीं पडे़गा। रम्माण का सफल आयोजन किया जाएगा।
- एसएस राणा, जिला पर्यटन अधिकारी, चमोली