इस बार के रक्षाबंधन की डोर भाई-बहन के स्नेह के साथ ही पर्यावरण के प्रति प्रेम का भी प्रदर्शन करेगी। चीड़ के पेड़ की पत्तियों (पिरूल) से बनाई जा रही राखियां पर्यावरण के प्रति संजीदगी के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में स्वरोजगार की प्रवृत्ति भी बढ़ाएंगी। इन दिनों खेतीखान में इस तरह की रोजाना 120 राखियां तैयार की जा रहीं हैं।
चंपावत जिले में पहली बार पिरूल से राखियां बनाई जा रही हैं। ये पहल की है एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप की डॉ. नूपुर ने। खेतीखान और त्यारसो क्षेत्र में चीड़ के पेड़ों की बहुतायत को देखते हुए उन्होंने इसके उपयोग करने के लिए ये पहल की। इसके लिए उन्होंने गांव की छह महिलाओं को राजी किया। खेतीखान की निकिता कर्नाटक, दीपा फर्त्याल, सुनीता मौनी, शिवानी मौनी, दिया महरा और कविता महरा पिछले महीने से पिरूल की राखियां बना रही हैं। महिलाएं बताती हैं कि एक राखी को बनाने में 12 मिनट लगते हैं।
घरेलू काम करने के साथ दिनभर चार घंटे काम करने पर एक महिला 20 राखियां बना रहीं हैं। इसके निर्माण में 30 से 50 रुपये की लागत आ रही है। इनकी ऑनलाइन बिक्री 60 से 100 रुपये तक में हो रही है। इन राखियों को इंस्टाग्राम हैंडल के जरिये बेचा जा रहा है। इस बार 3600 राखियां बनाने का लक्ष्य रखा गया है। अगले साल से इन राखियों को दुकानों के जरिये भी बेचने की योजना है।
चीड़ बहुल है पहाड़
राखियों से पहले क्षेत्र में चीड़ का उपयोग कई घरेलू सामान बनाने के लिए किया जा चुका है। खेतीखान क्षेत्र की कुछ महिलाएं चीड़ के पेड़ में होने वाले पिरूल से टोकरी, कंडी, पूजा थाली आदि उत्पाद बना रहीं हैं। चंपावत चीड़ बहुल जिला है। 80549.10 हेक्टेयर जंगल में से 27292.75 (33.88 प्रतिशत) में चीड़ है। ये ज्वलनशील चीड़ जंगलों में आग लगने की सबसे बड़ी वजह माने जाते हैं। चंपावत, लोहाघाट, काली कुमाऊं, देवीधुरा, भिंगराड़ा वन क्षेत्र में मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं। चीड़ की सूखी पत्तियां (पिरूल) गर्मियों में जंगल पर सबसे बड़ा खतरा बनती हैं। इससे बचने के लिए अब इसके विभिन्न उपयोग के प्रयास किए जा रहे हैं।
पिरूल की राखियां नया प्रयोग है। ये न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि स्थानीय जंगलों में निशुल्क उपलब्ध होने वाले कच्चे माल से बनने की वजह से ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका बढ़ाने का आसान उपाय भी है। इन राखियों को लेकर लोगों में उत्सुकता भी है।
- डॉ. नूपुर, फेलो, एसबीआई यूथ फॉर इंडिया योजना