गैरसैंण ब्लॉक का एक गांव लामबगड़ ऐसा भी है जहां आधा हिस्सा रात को या तो दीये की लौ के भरोसे रहता है या फिर अंधेरे में डूब जाता है। बिना बिजली के इस गांव को उत्तराखंड की राज्यसभा सांसद मनोरमा शर्मा ने गोद लिया है।
राज्यसभा में सांसद चुने जाने के बाद पहली बार मीडिया से मुखातिब मनोरमा शर्मा ने कहा कि किसी एक गांव को गोद लेने का मतलब यह कतई नहीं है कि अन्य गांवों की अनदेखी होगी। पर सीमित संसाधनों को देखते हुए एक गांव पर फोकस करने की रणनीति कारगर साबित हो सकती है।
ऐसे में उन्होंने गैरसैंण के लामबगड़ गांव को गोद लिया। यह उस लामबगड़ से अलग है जो बदरीनाथ रूट पर पांडुकेश्वर के पास स्थित है। गैरसैंण का गांव लामबगड़ दो अलग-अलग गांवों से मिलकर बना है।
करीब दो हजार की आबादी वाले इस गांव तक पहुंचने के लिए कच्ची सड़क है, वहीं गांव की खेती को जंगली जानवर पनपने ही नहीं देते। रही-सही कसर ओलावृष्टि पूरी कर देती है। ऐसे में गांव अब पलायन के कगार पर है।
मनोरमा के मुताबिक गैरसैंण की पट्टी खनसर के इस गांव से 2011-12 में वे पहली बार संपर्क में आईं थीं और तब से लगातार उनका गांव वालों से संपर्क बना हुआ है। खुद उनका गांव पौड़ी जिले में सतपुली के नजदीक है।