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क्या रेल बजट में इस बार भी हाशिये पर रहेगा उत्तराखंड?

Sat, 21 Feb 2015 03:36 PM IST
सुधाकर भट्ट/अमर उजाला, देहरादून
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कथनी और करनी में कितना फर्क होता है यह बात रेल मंत्रालय से बेहतर कोई और नहीं साबित कर सकता है।
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उत्तराखंड में चीन सीमा से सटे होने और चारधाम के साथ हरिद्वार-ऋषिकेश जैसे धर्मस्थलों वाले प्रदेश को रेल योजनाओं के लिए केंद्र सरकार खुद महत्वपूर्ण बताती रही लेकिन हकीकत यह है कि राज्य स्थापना के बाद यहां एक इंच नई लाइन नहीं बिछ सकी।

14 बरसों में इस राज्य के हिस्से में रेलबजट से सिर्फ चंद ट्रेनें, चंद ट्रेनों के फेरों में वृद्धि और सर्वे के साथ सिर्फ ऐलान ही आए हैं।

सामरिक लिहाज से चीन-नेपाल सीमा पर स्थित होने के साथ ही हरिद्वार, ऋषिकेश और चारधाम जैसे महत्वपूर्ण धर्मस्थल वाला प्रदेश उत्तराखंड रेलमैप में हमेशा हाशिये पर ही रहा। आलम यह है कि सीमांत क्षेत्रों तक ट्रेन पहुंचाने के लिए रेल ट्रैक बिछाने के लिए 112 साल पहले किए सर्वे से बात आगे नहीं बढ़ी। बीते साल मोदी सरकार ने चारधाम को रेल से जोड़ने का ऐलान किया था। उस दिशा में भी कोई कदम नहीं उठा है।
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ऋषिकेश और काठगोदाम से आगे रेल की पटरियां नहीं

चीन सीमा की सुरक्षा के लिए रक्षा मंत्रालय ने जो 14 परियोजनाएं चिह्नित की थीं। उनमें से चार उत्तराखंड से संबंधित थी। इनमें से एक ऋषिकेश-कर्णप्रयाग का काम सर्वे पर अटका पड़ा है। अन्य तीन परियोजनाओं पर तो जुंबिश भी नहीं है। यही हाल पर्यटन प्रदेश की रेल सेवा का भी है।

प्रदेश में आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या अब दो करोड़ तक पहुंच चुकी है। ऐसे में कर्णप्रयाग परियोजना से केदारनाथ और बदरीनाथ आने वाले तीर्थयात्रियों का सफर आसान होने और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की बात थी। यह मामला भी ठंडा पड़ा है।

प्रदेश में रेल कनेक्टिविटी से पहाड़ (मैदानी हिस्सों को छोड़कर) अछूता है। गढ़वाल में ऋषिकेश से आगे ट्रेन नहीं और कुमाऊं में काठगोदाम से आगे रेल की पटरियां नहीं हैं। यह हाल राज्य गठन से पहले का है। कनेक्टिविटी का हाल यह है कि  अगर कोई देहरादून से ट्रेन की सवारी करके ऋषिकेश जाना चाहे तो उसे वाया हरिद्वार होकर लगभग छह घंटे लगेंगे जबकि सड़क मार्ग से यही दूरी बमुश्किल एक घंटे की है।

देहरादून-सहारनपुर का सर्वे राज्य गठन से पहले हो चुका है लेकिन संबंधित फाइल कई रेल मंत्रालय में धूल खा रही है। इस बार के रेल बजट से पुरानी परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ने के साथ ही करीब एक दर्जन नई ट्रेनों की भी उम्मीद है। ये वे ट्रेनें हैं जिनके लिए पिछले लंबे समय से मांग की जा रही है।
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सीमा चौकसी के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाएं

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग-160 किलोमीटर, 4200 करोड़ रुपये की लागत
देहरादून-उत्तरकाशी-90 किलोमीटर, लागत स्पष्ट नहीं पर 60 करोड़ प्रति कि मी खर्च की संभावना
टनकपुर-बागेश्वर-155 किलोमीटर, करीब दो हजार करोड़ रुपये की लागत का अनुमान, अंग्रेजी हुक्मरानों ने 112 साल पहले इस ट्रैक का सर्वे किया था।
टनकपुर-जौलजीबी मार्ग : करीब 90 किलोमीटर, 112 साल पहले हुआ था सर्वे

दिसंबर 2012 में तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण जिन 14 रेल लाइनों का जिक्र लोक सभा में किया था, उनमें ये चार उत्तराखंड से संबंधित हैं।

ऐलान ही ऐलान, नहीं हुए काम
-एक इंच नई लाइन नहीं बिछी राज्य में गठन के बाद से अब तक
-4200 करोड़ रुपये की ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना पर निर्माण कार्य शुरू नहीं, फिलहाल मामला जियो स्पाटियल सर्वे पर अटका
-सहारनपुर -देहरादून रेलवे लाइन की घोणणा 1996 में हुई थी। इसकेबाद इस ट्रैक का सर्वे भी हुआ लेकिन इससे आगे बात नहीं बढ़ी।
-हरिद्वार-कोटद्वार-रामनगर को सीधी रेलसेवा से जोड़ने की मांग भी है अधूरी, सहित कालसी, उत्तरकाशी ट्रैक आदि का मसला भी अधर में गैरसैंण को कुमाऊं से जोड़ने की मांग अधर में है।
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