देहरादून शहर की सड़कों पर आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी लोगों के लिए बड़ी समस्या बन चुकी है। इनकी आबादी को नियंत्रित करने की दिशा में नगर निगम कुछ नहीं कर रहा है। ऐसे में बिना किसी सरकारी अनुदान के दान पर चलने वाली पशु प्रेमी संस्था राहत (पशु आश्रय एवं चिकित्सालय) आवारा कुत्तों की आबादी नियंत्रण करने की दिशा में शानदार काम कर रही है। बीते 10 सालों में यह संस्था सात हजार से अधिक कुत्तों की नसबंदी कर चुकी है।
ननूरखेड़ा तपोवन स्थित राहत पशु आश्रय व चिकित्सालय की वरिष्ठ सदस्य मानवी भट्ट का कहना है कि एनिमल बर्थ कंट्रोल प्रोग्राम यानी एबीसी वक्त की जरूरत है। अगर कुत्तों की आबादी बढ़ रही है तो इसके लिए हमें हस्तक्षेप करना चाहिए। कुत्तों (मादा) के नसबंदी के तमाम फायदे होते हैं। इसलिए हम मादा नसबंदी पर अधिक जोर देते हैं। हमारा टारगेट हर माह कम से कम सौ कुत्तों की नसबंदी करने का रहता है।
उन्होंने बताया कि सौ कुत्तों की नसबंदी पर एक माह में कम से कम एक हजार रुपये का खर्चा आता है। अच्छी दवाएं, मानव संसाधन, वाहन-तेल तथा श्वान के खानपान का खर्चा इसमें शामिल है। फिलहाल यह कार्य तो दान पर चल रहा है।