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हिमालयी राज्यों के हक के लिए दिल्ली में हल्लाबोल

Wed, 03 Dec 2014 03:25 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
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हिमालयी राज्य अपने हक के लिए देश की राजधानी दिल्ली में हल्ला बोलने की तैयारी में हैं। दिल्ली में दस और 11 दिसंबर को पर्वत दिवस से इसकी शुरुआत हो रही है।
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यह माना जा रहा है कि केंद्रीय योजना आयोग की ‘निष्क्रियता’ से बदले हालात का फायदा पर्वतीय राज्य ले सकते हैं। इंटीग्रेटेड माउंटेन इनीशिऐटिव (आईएमआई) संस्था इस पर बाकायदा नीतिगत दस्तावेज (पॉलिसी डाक्यूमेंट) भी लेकर आ रही है।

आइएमआई के अध्यक्ष और उत्तराखंड के मुख्य सचिव रह चुके डॉ. आर एसटोलिया के मुताबिक केंद्रीय योजना आयोग के खत्म होने की घोषणा 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने की थी।
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पर देश के नियोजन के इतिहास से जुड़ी रही इस संस्था पर अभी विमर्श की जरूरत है। 1979 में चीन ने भी अपनी केंद्रीय एजेंसी को खत्म कर इसी तरह का प्रयोग किया था।

पर चीन ने थिंक टैंक के रूप में उसी एजेंसी को आगे बढ़ाया था। चीन का प्रयोग एक तरह से वित्तीय और अन्य संसाधनों के विकेंद्रीकरण का भी था।

11 पर्वतीय राज्यों के प्रतिनिधि होंगे शामिल

हिमालयी राज्यों में इस मामले को लेकर विमर्श की जरूरत है कि केंद्रीय योजना आयोग के बाद राज्यों को किस तरह के प्लेटफार्म की जरूरत है और आयोग की आगे की भूमिका क्या रहेगी।

सम्मेलन में 11 पर्वतीय राज्यों के जन प्रतिनिधि, राज्य सभा सांसद, हिमालयी राज्यों के शोध संस्थानों के प्रतिनिधि वैज्ञानिक आदि शामिल हो रहे हैं।

प्रदेश से मुख्यमंत्री हरीश रावत और कृषि मंत्री हरक सिंह रावत के शामिल होने की उम्मीद है। समापन पर सांसद पीए संगमा शामिल होंगे। इसके अलावा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री केरिन रिज्जु के सामने सम्मेलन के प्रस्ताव रखे जाएंगे।

सम्मेलन के अन्य बिंदु
- जलवायु परिवर्तन और पर्वतीय राज्यों की स्थिति
- हिमालयी राज्यों में दीर्घकालिक खेती
- महिला किसान
- झूम (शिफ्टिंग) खेती
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केंद्रीय योजना आयोग के बिना हिलता नहीं था पत्ता

कभी यह समय भी था जब केंद्रीय योजना आयोग के बिना प्रदेश में पत्ता भी नहीं हिलता था। उत्तराखंड के कुल बजट में करीब 57 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से मिले अनुदान, सहायता आदि का है।

यह केंद्रीय योजना आयोग की संस्तुति पर बहुत हद तक निर्भर था। ऐसे में प्रदेश के अफसर भी लगातार इस कोशिश में रहते थे कि केंद्रीय योजना आयोग में प्रदेश की ढंग से पैरवी की जाए।

राज्य के अपने नियोजन का बुरा हाल
केंद्रीय योजना आयोग पर निर्भरता का नतीजा था कि प्रदेश की अपनी नियोजन की इकाइयों को बहुत ज्यादा महत्व नहीं मिला।

हाल यह है कि दर्जा धारी होने के बाद भी विधायक मयूख महर ने अभी तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद का दायित्व नहीं संभाला। मयूख महर का कहना है कि योजना आयोग के पास काम करने केलिए कुछ है ही नहीं।
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