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60% से कम घनत्व वाले वनों को वन न मानने पर प्रमुख सचिव वन व पीसीसीएफ की कोर्ट में पेशी

Tue, 11 Feb 2020 09:59 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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हाईकोर्ट ने दस हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनों को वन नहीं मानने के मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

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कोर्ट ने साफ किया है कि जवाब पेश नहीं करने की स्थिति में प्रमुख सचिव वन और पीसीसीएफ को 26 फरवरी को कोर्ट में पेश होना होगा। पूर्व में कोर्ट ने सरकार को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए थे लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार की ओर से अब तक जवाब दाखिल नहीं किया गया।

वरिष्ठ न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया एवं न्यायमूर्ति एनएस धनिक की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। नैनीताल निवासी पर्यावरणविद प्रो. अजय रावत, विनोद पांडे व रेनू पाल ने हाईकोर्ट में अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर कर कहा था कि 21 नवंबर 2019 को उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण अनुभाग ने एक आदेश जारी किया।
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इसमें उत्तराखंड में जहां दस हेक्टेयर से कम या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वन क्षेत्र हैं, उनको वनों की श्रेणी से बाहर रखा गया और उन्हें वन नहीं माना है।

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वनों का अर्थ क्षेत्रफल या घनत्व से नहीं

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह आदेश एक कार्यालय आदेश है जिसे लागू नहीं किया जा सकता है। याचिका में कहा कि न ही यह शासनादेश और न ही यह कैबिनेट से पारित आदेश है। सरकार ने इसे अपने लोगों को फायदा पहुंचान के लिए जारी किया है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि फॉरेस्ट कन्जर्वेशन एक्ट 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित हैं, जिसमें वनों की श्रेणी को भी विभाजित किया हुआ है।

इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनको किसी भी श्रेणी में नहीं रखा गया है। इन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल किया जाए ताकि इनके दोहन या कटान पर रोक लग सके। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि गोडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई भी वन क्षेत्र चाहे उसका मालिक कोई भी हो उसको वन क्षेत्र की श्रेणी में रखा जाएगा। वनों का अर्थ क्षेत्रफल या घनत्व से नहीं है।

विश्व भर में जहां 0.5 प्रतिशत क्षेत्र में पेड़-पौधे हैं या उनका घनत्व 10 प्रतिशत है तो उनको भी वनों की श्रेणी में रखा गया है। सरकार के इस आदेश पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने कहा है कि प्रदेश सरकार वनों की परिभाषा न बदले। उत्तराखंड में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र होने के कारण कई नदियों व सभ्यताओं का अस्तित्व बना हुआ है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 26 फरवरी की तिथि नियत की।
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