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मुश्किलों भरा है राष्ट्रपति का यह 'गुरु मंत्र'

Sun, 20 Oct 2013 12:47 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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जनहित के साथ नेताओं के निजी स्वार्थों से नौकरशाहों को राजनीतिक दबाव झेलना पड़ा है। यह राजनीतिक दबाव ही है जिसके चलते आए दिन नौकरशाहों के प्रभार पदलते हैं तो कई ऐसे भी हैं जो हर सरकार में मुख्य महकमों के प्रभारी रहते हैं।
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राजनीतिक दबाव होता है
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के अफसरों और नेताओं के बीच कामकाज को लेकर तालमेल का गुरु मंत्र बेहद अहम होने के साथ मुश्किलों भरा भी है।

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ऐसे कम ही मामलें हुए हैं जिसमें फाइल पर नौकरशाहों ने ऐसी टिप्पणियां दर्ज कर दी कि सरकार उसे लागू करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाई।

हालांकि ज्यादातर मामलों में राजनीतिक दबाव होता है, जिससे नौकरशाह फाइलों को लटकाते हैं, लेकिन फैसले भी लेते हैं। मंत्री हरक सिंह के लाभ के पद का मामला भी नौकरशाही पर दवाब का बड़ा उदाहरण है। जनहित के नाम पर राजनीतिक घोषणा में सीएम की घोषणाओं लिस्ट को लिया जा सकता है, जो केवल 10 से 15 फीसदी धरातल पर आ पाती हैं।

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नेताओं के दवाब न सह पाने की स्थिति में अकसर सचिवों से विभाग ले लिये जाते हैं। आईटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व, सैनिक कल्याण, वित्त आदि ऐसे महकमे हैं जिनमें अकसर नेताओं की नाराजगी से बदलाव होता है।
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दबाव में होती हैं नियुक्तियां
विभागों में अपनी पसंद का एचओडी बनाने के लिए नेता अकसर शासन पर दबाव बनाते हैं। दमयंती रावत प्रकरण इसका ताजा उदाहरण है, जिसे नियमों को ताक पर रख राजनीतिक दबाव में शासन ने स्वीकृति दी थी।

स्वास्थ्य विभाग में हर बार स्थाई डीजी हेल्थ के बदले कार्यवाहक तैनाती भी राजनीतिक दखल का नतीजा है। पेयजल निगम में एमडी की तैनाती भी इससे जुड़ी है।

स्थानांतरण के मामले
हर मंत्री व विधायक अपने क्षेत्र में अपनी पसंद के जिलाधिकारियों और एसएसपी चाहते हैं। विभागीय कर्मचारियों व अधिकारियों के तबादलों में भी नेताओं का भारी दबाव रहता है।

चिकित्सा व शिक्षा विभाग में मास्टरों और डाक्टरों के तबादलों में अकसर नौकरशाहों और नेताओं में ठनती है। शासन से भेजी जाने वाली तबादला सूची को मंत्री बदल देते हैं, जिसे न मानने से विभागीय सचिव अकसर बदले जाते हैं।

जनहित से अधिक राजनीतिक दृष्टिकोण
ऐसे कई मामले हैं जो जनहित में बताए जाते हैं, लेकिन उनका राजनीतिक पहलु ज्यादा होता है। सिटूरजिया व हाइड्रोपावर ऐसे दो मामले हैं जिनमें फाइल पास करवाने को नौकरशाहों पर दबाव रहा।

लैंड यूज बदला गया जिससे दो करोड़ का राजस्व नुकसान हुआ। सिडकुल फेज वन और फेज टू इससे विपरित है जिसपर कई तरह के सवाल खड़े होने के बावजूद नौकरशाहों ने मूल रूप दिया।
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