उत्तराखंड विधानसभा में विशेष सत्र के दौरान राष्ट्रपति के संबोधन से भी जाहिर हुआ कि जन के साथ जंगल प्रदेश की धरोहर हैं।
उत्तराखंड के रैनी गांव की गौरा देवी और पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा के बहाने चिपको का जिक्र, वन पंचायतों की देश की एकमात्र व्यवस्था पर राष्ट्रपति का ध्यान यूं ही नहीं गया।
राष्ट्रपति ने चिपको का गीत ‘जल है हमारा, जमीन है हमारी, जंगल है हमारा, उन्हें हमारे पूर्वजों ने रोपा है, अब हमें ही उनकी रक्षा करनी होगी’ भी सुनाया। राष्ट्रपति ने यह जिक्र उस राज्य के लिए किया जिसके लिए जंगल एक ऐसी धरोहर है जिसे विकास में बाधा बताया जा रहा है।
वन संरक्षण की ऐवज में उसे ग्रीन बोनस की दरकार है। प्रदेश की 27 हजार मेगावाट ऊर्जा क्षमता का उपयोग न हो पाने की एक वजह वन संरक्षण बताई जा रही है। वन पंचायतें हाशिए पर हैं।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पिछले 14 साल से चली आ रही विसंगति की ओर भी ध्यान दिलाया। बेहद शालीन शब्दों में राष्ट्रपति ने विकास में पीछे छूट गए प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्र की ओर भी इशारा किया। राष्ट्रपति का संबोधन यह बताने के लिए भी काफी था कि पर्यावरण संरक्षण उत्तराखंड के लिए बेहद जरूरी है और प्रदेश की बहुत सी धरोहर वन संपदा से ही जुड़ती हैं।
विशेष सत्र में राष्ट्रपति ने कहा कि उत्तराखंड ने दस प्रतिशत की औसत आर्थिक विकास दर हासिल की है, लेकिन पहाड़ की इसमें पूरी भागीदारी नहीं हो पाई। 2003 में विशेष औद्योगिक पैकेज के घोषित होते ही तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने उद्योगों को विकास का आधार बनाने की नीति लागू की थी।
2007 तक प्रदेश को इसके परिणाम भी मिल गए थे। दस प्रतिशत की आर्थिक विकास दर तो प्रदेश को मिली पर पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा का राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी प्रदेश में उभरकर सामने आया। तब से यह मुद्दा लगातार बना हुआ है। यह उस राज्य का हाल है कि जिसके दस जिले सीधे तौर पर पर्वतीय हैं। राष्ट्रपति जाने-अनजाने इस विसंगति के बहाने प्रदेश के विकास पर भी टिप्पणी कर गए।