प्रदेश में दवा संकट खत्म करने को औषधि क्रय नीति में बदलाव किया जा सकता है। विभागीय मंत्री, शासन और स्वास्थ्य महानिदेशालय के स्तर से अब तक हुई वार्ता में इस मुद्दे पर सहमति बनी है। शासन स्तर पर जल्द ही इसकी कवायद शुरू हो सकती है।
नई औषधि क्रय नीति की तमाम जटिल शर्तों के चलते किसी भी मुख्य चिकित्साधिकारी के स्तर से दवाओं व अन्य सामान की खरीद नहीं हो सकी है। टेंडर में शामिल होने के लिए राज्य की फर्मों का 20 करोड़ और राज्य से बाहर की फर्मों का 70 करोड़ से अधिक का टर्नओवर होना अनिवार्य है।
दवा कंपनियां नहीं दिखा रहीं दिलचस्पी
इसके अलावा निर्माता फर्म को दवा 23 फीसदी कम कीमत पर उपलब्ध कराने की शर्त का भी पालन करना होगा। इसके चलते मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय से हो रही खरीद में किसी भी दवा निर्माता फर्म ने दिलचस्पी नहीं दिखाई है।
यही वजह है कि प्रदेश के तमाम सरकारी अस्पतालों में दवाओं का संकट बना हुआ है। पहले अस्पताल और जिला स्तर पर लोकल परचेज (एलपी), इएसआई, कोटेशन बेस, इमरजेंसी और रेट कांट्रेक्ट (आरसी) के जरिये दवा खरीदने का विकल्प होता था, लेकिन केंद्रीयकृत व्यवस्था लागू होने के बाद केवल महानिदेशालय और मुख्य चिकित्साधिकारी के स्तर से ही दवाओं की खरीद हो सकती है।
इनका है कहना
दवा खरीद की प्रक्रिया को पारदर्शी और बेहतर बनाने के लिए नई औषधि क्रय नीति बनाई गई है, लेकिन इसमें कुछ व्यवहारिक दिक्कतें आ रही हैं। बहुत संभव है कि नीति की कुछ जटिलताओं को कम करने के लिए संशोधन किया जाए। शासन स्तर से इस पर निर्णय लिया जाएगा।
-डॉ. कुसुम नरियाल, स्वास्थ्य महानिदेशक