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कहीं देखी है कुदरत के साथ ऐसी कदमताल

Fri, 21 Feb 2014 12:41 PM IST
विजेंद्र श्रीवास्तव/ अमर उजाला, हल्द्वानी
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ये हर साल करीब नौ महीने कुदरत की गोद में और पशुओं के बीच जिंदगी गुजारते हैं। उन्हें इस पर बिल्कुल भी अफसोस नहीं, बल्कि कड़ाके की सर्दी में भी आसमान तले खुशमिजाजी से रहते हैं।
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दुर्गम चोटियों और नदियों को लांघकर उत्तरकाशी से सैकड़ों किमी दूर चलकर नंधौर के जंगल में करीब 400 पशु लेकर पहुंचे भेड़पालकों की जिंदगी सदियों से यूं ही कट रही है।

मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के वासी

समय के साथ जमाना बदला, लेकिन कुदरत, इंसान और पशुओं का यह अनूठा सहजीवन अभी भी पहाड़ में जीवित है।

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काश! इन भेड़ पालकों के उत्पादों की मार्केटिंग करने की व्यवस्था सरकार या गैर सरकारी संस्थाएं करतीं तो इनकी जिदंगी भी बदल गई होती।

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उत्तरकाशी के धराली गांव (चीन सीमा के करीब) से ढाई महीने तक लगातार चलते हुए भेड़ पालक हल्द्वानी वन प्रभाग के नंधौर जंगल में पहुंचे हैं। इनका डेरा इन दिनों हल्द्वानी वन प्रभाग के नंधौर रेंज में कराकोट बीट कंपार्टमेंट संख्या-7 में जमा है।

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डेरे के मुखिया अर्जुन सिंह कहते हैं कि वह उत्तरकाशी जिले के धराली गांव (तहसील भटवाड़ी) से यहां पहुंचे हैं। वह मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के वासी हैं। अब यहां बस गए हैं।

हर साल पहुंचते हैं नैनीताल

एक दिन में मौसम, मौके के हिसाब से तीन से दस किमी की दूरी तय की। भेड़ पालकों के मुताबिक ये फासला करीब 500 किलोमीटर बैठता है। उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा (मर्चूला) होते हुए हर साल नैनीताल जिले में पहुंचते हैं।

35 रुपए किलो ऊन
डेरे के त्रिलोक सिंह, रणवीर सिंह बताते हैं कि ऊन 35 रुपए किलो तक बिकता है। सहारनपुर आदि जगहों से आकर लोग चोरगलिया में ही इसकी खरीद करते हैं। डेढ़ से दो क्विंटल तक ऊन बिकता है। उनके पास करीब चार सौ भेड़, बकरी आदि हैं।

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वन कर्मी धर्मपाल, केशव भट्ट और प्रेम मसीह कहते हैं कि भेड़पालकों को चराई का परमिट दिया जाता है। उसकी फीस भी जमा होती है। खास बात यह कि यह कभी डेरा बनाने के बाद कभी यहां कब्जे नहीं जमाते और समय पूरा होते ही वापस लौट जाते हैं।

पिता से बेटे तक पहुंचता है रास्ते का ‘ज्ञान’

दुर्गम रास्ते कैसे याद रहते हैं। इसका जवाब देते हुए अर्जुन सिंह कहते हैं कि रास्ते की पहचान हमारे पिताजी ने कराई। इसी तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आदत और हुनर पहुंचता है। इसके लिए जीपीएस, कंपास, नक्शे की जरूरत नहीं पड़ती है।

‘रक्षक’ की भी डिमांड
भोटिया कुत्ते को लोग इनसे मुंहमांगी कीमत में खरीदते है। सैकड़ों भेड़ों की सुरक्षा और नियंत्रित करने की जिम्मेदारी भोटिया कुत्तों की होती है। ये कुत्ते भेड़ों को समूह से अलग नहीं होने देते और कोई भी खतरा होने पर आक्रमण कर देते हैं।

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विशाल आकार, बाल और वफादारी में बेमिसाल होने के कारण शौकीन लोग कोई भी कीमत देने को तैयार रहते हैं। डेरे के मुखिया अर्जुन सिंह कहते हैं कि हमारे साथ लूसी, शेरू, मोटू, टाइगर कुत्ते आए हैं, इनके साथ पिल्ले भी हैं।
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विकास बोर्ड का पता नहीं

भेड़पालकों की समस्याओं को हल करने, प्रोत्साहन और योजनाएं बनाने के लिए भेड़पालक विकास बोर्ड का गठन किया गया। यह पशुपालन निदेशालय में था। बोर्ड इन भेड़पालकों के लिए क्या काम कर रहा है, यह किसी को पता नहीं है।

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न ही कुमाऊं विकास निगम और न ही गैर सरकारी संगठन इनके उत्पादों को बाजार में खपाने के लिए अभी तक आगे आए हैं।

खाडू के नहीं कटते बाल
भेड़ों के समूह में तुलनात्मक तौर पर खाडू बड़ा होता है। इसके बाल नहीं काटे जाते हैं। इसके अलावा सफेद भेड़ को हासी, काली भेड़ को मोरी और सफेद-काली रंग वाली भेड़ को दो बट्टे कहा जाता है।

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भेड़ों की पहचान के लिए भेड़पालक खास निशान बनाते हैं। भेड़ों के कान या दूसरी जगह कटिंग कर खास निशान बनाया जाता है।
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