दिनेश धनै के नामांकन करने की घोषणा से कांग्रेस मुश्किल में है।
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सियासी संकट से निजात दिलाने वाले प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) के राज्यसभा चुनाव में अलग मोर्चा खोलने से सीएम हरीश रावत सरकार पर संकट के बादल घिरने लगे हैं। पीडीएफ इस समय सियासत की ड्राइविंग सीट पर है।
पीडीएफ के खिसकने का जोखिम उठाने की स्थिति में सरकार नहीं है। राज्यसभा सांसद का नामांकन दाखिल करने के पीछे मंत्री दिनेश धनै की मंशा साफ है कि वह अपना ही नहीं बल्कि फ्रंट का भी सियासी भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं। सीबीआई जांच में घिरे सीएम के सामने अब सरकार को सुरक्षित रखने के साथ राज्यसभा में अपने प्रत्याशी को भेजने के साथ पीडीएफ से कोई नया समझौता करने का चुनौती रहेगी।
18 मार्च के सियासी संकट के दौरान भाजपा से पीडीएफ की निकटता को लेकर लगातार कयास लगते रहे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा। सदन में बहुमत के लिए पीडीएफ के 6 का आंकड़ा ही हरीश रावत सरकार को बचा पाया।
धनै का दावा सोची समझी सियासी चाल
इसके पहले पीडीएफ हर बार हरीश रावत के साथ रही है।
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इससे पहले जब हरीश रावत वर्ष 2014 में सीएम बने तब भी पीडीएफ के समर्थन से सदन में विश्वास मत हासिल कर पाए थे।
पीडीएफ के सदस्य और सरकार में मंत्री दिनेश धनै का यह एकाएक लिया फैसला नहीं है कि वह राज्यसभा सांसद के लिए नामांकन दाखिल करेंगे बल्कि सोची समझी सियासी चाल है।
भाजपा के विकल्प तो पीडीएफ के लिए हमेशा खुले थे, लेकिन इससे इतर भी फ्रंट वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में अपने लिए बेहतर स्थिति चाहता है।
दिनेश धनै की टिहरी विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की दावेदारी रही है। उन्हीं को हराकर धनै विधानसभा पहुंचे हैं। अगर उनका राज्यसभा का दांव नहीं चला तो धनै यह सुनिश्चित करने के मूड में हैं कि अगले चुनावों में टिहरी से कांग्रेस के स्तर से कोई खिलाफत ना हो।
पैराशूट प्रत्याशी की संभावनाएं क्षीण
राज्यसभा
पीडीएफ के विधायक धनै की दावेदारी राज्यसभा में भाजपा कांग्रेस की पैराशूट प्रत्याशी उतारे जाने की संभावनाओं को विराम लगा सकती है। पीडीएफ पहाड़ और राज्य के प्रत्याशी के समर्थन में रही है। सांसद चुनाव में अंकगणित पीडीएफ के पक्ष में है। ऐसे में अगर फ्रंट से धनै के नामांकन का दांव फेल भी जाता है तो प्रत्याशी उनकी पसंद का ही रहेगा।
सीबीआई की जांच
कांग्रेस से राज्यसभा सीट की मांग को सियासी रणनीतिकार बेहद सटीक चाल मान रहे हैं। सीबीआई जांच किस करवट बैठेगी इसकी चिंता पीडीएफ को भी है। सरकार के सहयोगी होने के कारण जांच एजेंसी का रडार उनकी तरफ भी घूम सकता है। ऐसे में सियासी पाला बदलने से फ्रंट खुद को सुरक्षित कर सकता है।
बोले धनै
यह निर्णय बहुत सोच समझ कर लिया है। सरकार के साथ पिछले चार वर्र्षों से जुड़े हैं, लेकिन हमें मिला क्या? मेरे साथ तो पहले भी अन्याय हुआ है मुझे ढ़ाई वर्ष तक मंत्री नहीं बनाया। पीडीएफ इस निर्णय पर एकमत है। अगर कांग्रेस हमारे निर्णय का सम्मान नहीं करेगी तो हम कोई भी निर्णय लेने को स्वतंत्र हैं।
-दिनेश धनै (पर्यटन मंत्री), पीडीएफ
पीडीएफ राज्यसभा में अपने एक सहयोगी के नामांकन को लेकर गंभीरता से विचार कर रही है। हमारे कांग्रेस से बेहतर रिश्ते रहे हैं। इस मुद्दे पर फ्रंट की बुधवार को बैठक होगी, जिसमें हम तय करेंगे कि अगर अगली रणनीति क्या रहेगी।
-मंत्री प्रसाद नैथानी (शिक्षा मंत्री), नेता पीडीएफ