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हड़ताल से थम गई पर्वतीय जिलों की पतवार

Mon, 20 Jan 2014 11:04 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पटवारी पिछली एक जनवरी से हड़ताल पर हैं। इससे आपदा राहत समेत पहाड़ के लोगों के कई काम अटक रहे हैं।
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कानून-व्यवस्था भी रामभरोसे
प्रमाणपत्रों के लिए लोगों को भटकना पड़ रहा है। आपदा से नुकसान का आकलन भी नहीं हो पा रहा है। पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में पटवारी ही पुलिस का काम भी करते हैं। ऐसे में इन इलाकों की कानून-व्यवस्था भी रामभरोसे है।

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इतना होने के बावजूद सरकार की ओर से हड़ताल खत्म करवाने की अब तक कोई पहल नहीं हुई है। न तो उनकी मांगें पूरी करने की बात हो रही है और उन पर कार्रवाई की।

मालूम हो कि इससे पहले पटवारी मई 2008 से अप्रैल 2011 तक करीब तीन साल तक पुलिस कार्य का बहिष्कार कर चुके हैं।

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जिलों से लेकर प्रदेश मुख्यालय तक धरने-प्रदर्शन को एक पखवाड़ा बीत चुका है। लेकिन जनता और आपदा पीड़ितों की समस्याओं की चिंता किसी को नहीं है।

हड़ताल कर रहे पटवारियों की कोई सुध तक नहीं ली गई। प्रदेश सरकार ने हाल में मिनिस्ट्रीयल के लिपिकीय संवर्ग को 10 प्रतिशत सीधी भरती नायब तहसीलदार के पद पर देने का फैसला किया था।
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इससे भड़के पर्वतीय पटवारियों ने राजस्व और पुलिस दोनों कार्य छोड़ दिए हैं। पूरे देश में उत्तराखंड में ही यह व्यवस्था है कि पर्वतीय पटवारी राजस्व के अतिरिक्त पुलिस का काम भी करते हैं।

जब तक सरकार मांगें नहीं मानती, हड़ताल नहीं टूटेगी। अब तक किसी सरकारी प्रतिनिधि ने हमसे बात नहीं की है। 23 जनवरी को मुख्यमंत्री आवास कूच करेंगे।
- रामपाल सिंह रावत, प्रदेश अध्यक्ष, पर्वतीय पटवारी महासंघ

हर समस्या का समाधान बातचीत से ही होता है। मेरी अब तक हड़ताली पटवारियों से बातचीत ही नहीं हुई है। कोशिश की जाएगी कि बातचीत से समाधान निकाला जाए।
- यशपाल आर्य, राजस्व मंत्री

यह है हाल
पटवारियों की हड़ताल के चलते हत्या जैसे संगीन अपराधों की घटना तक की जानकारी पुलिस को समय पर नहीं मिल पा रही है। पौड़ी जिले के सुंगरखाल में 14 जनवरी की शाम को एक व्यक्ति ने पत्नी की हत्या कर दी। लेकिन राजस्व पुलिस को इसकी जानकारी घटना के दूसरे दिन डेढ़ बजे मिल पाई।
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पुरोला में छात्रा की हत्या पिछले 30 दिसंबर को ही कर दी गई थी। 18 जनवरी को परिजन पुलिस के पास पहुंचे तभी मामले का खुलासा हुआ। पटवारी हड़ताल पर न होते तो ऐसी स्थिति नहीं आती।
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