उत्तराखंड में पटवारियों को अब राजस्व पुलिस का काम छोड़ना महंगा पड़ सकता है। शासन नो वर्क नो पे के आधार पर अक्टूबर माह से पटवारियों का वेतन काटने की तैयारी में है।
आधी-अधूरी नहीं होती ड्यूटी
सूत्रों के मुताबिक शुक्रवार को इसका आदेश जारी होने की पूरी संभावना है। शासन को बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट का आदेश भी मिला। कहा जा रहा है कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ड्यूटी आधी-अधूरी नहीं होती। सरकार नो वर्क नो पे को पूरी तरह से लागू करे। इसके बाद शासन में इस पर होमवर्क भी शुरू हो गया है।
पर्वतीय पटवारी अक्तूबर 2014 से राजस्व पुलिस का कार्य छोड़ चुके हैं। इनका कहना है कि पुलिस कार्य करने के लिए सरकार कोई संसाधन नहीं दे रही है। लिहाजा पटवारी संसाधन न मिलने तक इस काम को नहीं करेंगे। पटवारियों का यह भी कहना है कि उनकी तैनाती राजस्व विभाग में लेखा कार्य के लिए है।
देश की एकमात्र व्यवस्था के तहत पटवारी पर्वतीय जिलों में पुलिस का काम भी कर रहे हैं। इस काम के लिए इन्हें सिर्फ एक माह का अतिरिक्त वेतन देने की व्यवस्था 2014 मार्च में की गई थी। यह वेतन भी इन्हें अब अप्रैल माह में मिलना है। दूसरी ओर भू राजस्व का काम पटवारी बदस्तूर जारी रखे हुए हैं।
पीछे हटने को तैयार नहीं पटवारी
पर्वतीय पटवारी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने के पक्ष में हैं। पर्वतीय पटवारी महासंघ के संरक्षक बीपी जगूड़ी के मुताबिक पटवारियों ने काम करना बंद नहीं किया बल्कि संसाधनों की कमी के कारण काम छोड़ा है। पटवारी का कार्य तो किया ही जा रहा है और वेतन भी पटवारियों को पटवारी के काम का ही मिलता है।
जगूड़ी के मुताबिक मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई समझौता वार्ता में कई बिंदुओं पर सहमति बनी थी। अधिकतर मामलों में एक माह में आदेश जारी करने को कहा गया था। पर छह माह बीतने के बाद भी आदेश जारी नहीं हुए। राजस्व मंत्री ने एक बार भी मामले की समीक्षा नहीं की।
...फिर कोर्ट के इशारे पर सरकार
नो वर्क नो पे के मामले में एक बार फिर सरकार हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सक्रिय होती दिख रही है। हालांकि इससे पहले समीक्षा अधिकारियों की हड़ताल के दौरान हाईकोर्ट के आदेश पर सरकार ने नो वर्क नो पे लागू किया था। हालांकि इस बार खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राजस्व पुलिस का काम छोड़ने पर पटवारियों को सख्त कदम की चेतावनी पहले ही दे दी थी।