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पंचायत चुनाव के लिए गियर अप हो रहे नेताजी

Wed, 21 May 2014 12:17 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के पंचायत चुनाव में इस बार भी लोगों को नेताजी के वादों और आश्वासन पर भरोसा करके प्रतिनिधि चुनना होगा।
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कार्यों की फेहरिस्त नहीं
कारण यह कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के पास ही पंचायतों में गिनाने भर के लिए कार्यों की फेहरिस्त नहीं है। हकीकत यह है कि ले देकर वित्त आयोगों की वित्तीय संस्तुतियों को ही आधा अधूरा प्रदेश में लागू किया जा सका।

पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने, पंचायतों को अधिकार देने के मामले में राजनीतिक दल बुरी तरह से विफल रहे। नतीजा यह है कि राज्य गठन के13 साल बाद भी पंचायतों का एक भी विषय पर प्रदेश में अधिकार नहीं मिल पाया है।
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पंचायत चुनाव जून माह में होने हैं और 26 मई से पंचायत आचार संहिता लागू होने की संभावना है। ऐसे में अभी तक लोक सभा चुनाव में उलझे राजनीतिक दल अब पंचायत चुनाव के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।

लोक सभा चुनाव में दिल्ली में सरकार चुनी गई। पर पंचायतों का गठन स्थानीय स्तर पर होना है। लिहाजा पंचायतों में दबदबा सीधे तौर पर सरकार की प्रतिष्ठा से जुड़ा मसला बन गया है।

संविधान की व्यवस्था के मुताबिक दिए जाने हैं अधिकार
पंचायतों के अधिकार का मसला भी इसी से जुड़ा हुआ है। संविधान की व्यवस्था के मुताबिक पंचायतों को स्थानीय स्तर पर प्राथमिक शिक्षा, रोजगार, निर्माण, स्वास्थ्य आदि 29 विषयों पर पूरे अधिकार दिए जाने हैं।

इसके लिए संबंधित विभागों का संबंधित पंचायतों के अधीन भी किया जाना है। यह भी तय होना है कि पंचायतों के किन आदेशों का पालन सरकारी विभाग करेंगे और किन बातों का नहीं।

इसे एक्टिविटी मैपिंग कहा गया। पर प्रदेश में अभी तक यह नहीं किया गया। यह एक तरह से सरकार से नियंत्रण छीन कर पंचायतों को देने जैसा ही है।

यही हाल पंचायतों का आत्मनिर्भर बनाने का है। वित्त राज्य आयोगों की संस्तुतियों को अभी तक सरकारें ठंडे बस्ते में डालती रही हैं।

तीनों राज्य वित्त आयोगों की संस्तुतियां रही हैं कि पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए और अधिक आर्थिक रूप से आजादी दी जाए।

पंचायतों में कर्मियों की कमी दूर करने से लेकर प्रशिक्षण की व्यवस्था करनें तक का सुझाव दिया गया था।

साफ है कि इस बार भी पंचायत चुनाव में उतर रहे राजनीतिक दलों को एक बार फिर से आश्वासनों और वादों के सहारे ही चुनाव लड़ना होगा।

ऐसे में चुनाव परिणाम इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पंचायत प्रतिनिधि राजनीतिक दलों की बात पर कितना यकीन करते हैं।

विकास कार्यों पर फिर आचार संहिता का शिकंजा
प्रदेश के विकास कार्य पर एक बार फिर से आचार संहिता का अड़ंगा लगने वाला है। हालांकि पंचायत चुनाव की आचार संहिता में सरकार के लिए बहुत हद तक रियायत भी रहेगी।

पर प्रदेश भर को प्रभावित करने वाले कामों को कराना सरकार के लिए टेड़ी खीर साबित हो सकता है। इतना जरूर है कि राज्य निर्वाचन आयोग आपदा से सबंधित कामों में लचीला रवैया रखने का आश्वासन दे रहा है।
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लोक सभा चुनाव में ही इस बार प्रदेश सरकार को पुनर्निर्माण से संबंधित कार्य में हाथ तंग रखना पड़ा। 18 मई को आचार संहिता समाप्त होने के बाद ही अब सरकार खुल कर बैटिंग करने की स्थिति में हैं।

प्रदेश सरकार के सामने अभी कई काम हैं। पुनर्वास के मामले में सरकार को फैसला करना है।द्घ केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्य को अंजाम देना है।

कौन सा काम जरूरी तय करना होगा
पुनर्निर्माण के तहत ही निविदा स्तर पर रुक गए कामों को धरातल पर उतारना है। इसमें सड़कों से लेकर पुलों के निर्माण कार्य का मसला शामिल है।

जाहिर है कि सरकार को यह काम पंचायत आचार संहिता के लागू होने से पहले करने होंगे या फिर राज्य निर्वाचन आयोग की स्वीकृति लेनी होगी।

आयोग को भी यह तय करना होगा कि कौन सा काम जरूरी है और कौन सा काम मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है। जाहिर है कि अड़ंगा मौजूद है।
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