एक आरोपी, 18 गवाह और मुकदमे के 23 साल। देहरादून में ओएनजीसी के निदेशक पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में चला केस इतना लंबा खिंचा कि आरोपी रिटायर हो गए और अब फैसला आया तो वह वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आ गए हैं।
कैसे बढ़ेगा दोषियों पर कानून व्यवस्था का डर
सीबीआई कोर्ट से इस मामले में वर्षों तक सिर्फ तारीख पर तारीख मिलती रही। लेकिन किसी मामले के इतना लंबा खिंचने से यह सवाल उठने लगा है कि ऐसे में दोषियों पर कानून व्यवस्था का डर कैसे बढ़ेगा।
कानून के जानकार मानते हैं कि इस मामले में अभियोजन पक्ष सुस्त बना रहा। वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस राघव का कहना है कि किसी केस के निस्तारण के लिए जो पक्ष जिम्मेदार होते हैं, इस मामले में वे सभी विफल रहे।
स्पष्ट है कि सीबीआई पैरवी में कमजोर रही, जबकि बचाव पक्ष मामले को लटकाए रखने में कामयाब हुआ। राघव कहते हैं कि अपराधियों में डर बढ़ाने के लिए किसी मामले में फैसला जल्द आना जरूरी है।
वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर तिवारी कहते हैं कि सीबीआई तेजी दिखाती तो फैसला जल्द आ जाता। अब दोषी हाईकोर्ट में चुनौती दे सकता है। हाईकोर्ट कब फैसला देगा यह कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है।
यह मामला पहले यूपी में चला। उत्तराखंड अलग राज्य बनने के बाद केस कहां चलेगा कुछ समय यह निर्णय होने में लगा। इसके बाद कभी गवाह कोर्ट में पेश नहीं हुए तो कभी अभियुक्त, इसके अलावा वकीलों की हड़ताल, कोर्ट न लगना आदि इसमें देरी की वजह रही हैं।
- पंकज गुप्ता, लोक अभियोजक सीबीआई