रानीबाग इकाई में 1995 से 2000 तक जी-10 के नाम से सोने का बिस्कुट लगी घड़ी भी बनाई गई। इसकी कीमत लगभग 11 हजार रुपए थी। घड़ी की खासियत ही यह थी कि सुई के नीचे छोटा सा सोने का बिस्कुट लगा होता था।सारी घड़ियां हाथों-हाथ बिकी थीं।
एचएमटी की घड़ियों के लिए आर्मी कैंटीन में भी लोगों को इंतजार करना पड़ता था। पूरे देश में लगभग छह लाख घड़ियों का ऑर्डर सालाना एचएमटी वॉच ग्रुप को मिलता था। आर्मी कैंटीन को घड़ियों की सप्लाई करने में लगभग एक माह का समय लग जाता था। आर्मी कैंटीन में घड़ी के आने की बेताबी से प्रतीक्षा की जाती थी।
1993 में टाइटन को लाइसेंस मिलने के बाद से ही एचएमटी की स्थिति खराब होने लगी। टाइटन ने बाजार के अनुरूप अपने को ढाला और क्वार्ट्ज घड़ियों की श्रृंखला बाजार में उतारी। एचएमटी प्रबंधन ने अपने को अपडेट नहीं किया। वर्ष 1995 से एचएमटी का डाउन फाल शुरू हो गया।
जनता, कोहिनूर, पायलट और सोना थी पहली पसंद
एचएमटी वॉच ग्रुप के स्वर्णिम दौर में कोहिनूर, पायलट, जनता ओर सोना के नाम से बनने वाली घड़ियां लोगों की पहली पसंद हुआ करती थी। इन घड़ियों की सबसे अधिक मांग थी। इनकी कीमत भी अधिक होती थी।
एचएमटी रानीबाग यूनिट 1983 में स्थापित हुई और 1985 में कारखाने में उत्पादन शुरू हो गया। तब कारखाने में 1250 से अधिक अधिकारी एवं कर्मचारी थे। वर्ष 1990 से 1993 तक एचएमटी घड़ियों का स्वर्णिम दौर रहा। रानीबाग यूनिट में प्रतिवर्ष 16 से 18 लाख घड़ियां बनती थीं।
शोरूमों में घड़ियों की मांग पूरी नहीं हो पाती थी। रानीबाग से घड़ियां बनकर दिल्ली जाती थीं। प्राइवेट कंपनियों की आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन से एचएमटी की घड़ियां बाजार में टिक नहीं पाई और साल 2014 में भारत सरकार ने एचएमटी कंपनी को बंद करने का फैसला लिया था।