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अल्मोड़ा के किसी अस्पताल में नहीं होती जच्चा-बच्चा की 'देखभाल'

Fri, 17 Jun 2016 12:22 PM IST
रमेश जोशी/ अमर उजाला, अल्मोड़ा
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- फोटो : concept photo
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स्वास्थ्य सेवाओं पर उत्तराखंड सरकार हर साल भारी भरकम बजट खर्च कर रही है। मातृ, शिशु मृत्यु दर में कमी के लिए भी तमाम तरह के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, इसके बावजूद प्रसव के दौरान आए दिन शिशु, गर्भवती महिलाओं की मौत हो रही है।
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जिले के किसी अस्पताल में सिक न्यू बोर्न बेबी केयर यूनिट (एसएनबीसीयू) नहीं है। ऐसे में जिला मुख्यालय के अस्पतालों में प्रसव के लिए पहुंचने वाली महिलाओं को हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है। इससे जहां गर्भवतियों को मानसिक वेदना से गुजरना पड़ता है वहीं परिजनों को भी नुकसान हो रहा है। 

जिला मुख्यालय में महिला और बेस अस्पताल में माह में औसत 150 से अधिक प्रसव होते हैं लेकिन जटिल मामलों में सुविधाओं के अभाव के चलते नहीं चाहते हुए भी प्रसव पीड़ित महिलाओं को हायर सेंटर रेफर करना डाक्टरों की मजबूरी है। प्रीमैच्योर, शुगर पीड़ित महिलाओं, हायर ऐज डिलीवरी में काफी जोखिम होता है।
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अस्पतालों में एसएनबीसीयू सुविधा के बगैर इन मामलों में कोई भी डॉक्टर जोखिम नहीं उठाता है ताकि कि नवजात के जीवन को संकट हो। इस यूनिट में बार रोग विशेषज्ञ की देखरेख में कम वजनी, गर्भ से निमोनिया, पीलिया आदि रोगों से ग्रस्त नवजातों को बेहतर उपचार दिया जाता है। जिले के किसी भी अस्पताल में एसएनबीसीयू सुविधा नहीं है।

यह सुविधा न होने से अस्पतालों द्वारा गर्भवती महिलाओं को हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी अस्पताल के लिए रेफर किया जाता है। इससे गर्भवती महिलाओं को मानसिक पीड़ा के साथ ही हल्द्वानी पहुंचने का जोखिम रहता है। साथ ही परिजनों को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. निशा पांडे ने बताया कि हायर ऐज, प्री मैच्योर, शुगर पीड़ित आदि समस्याओं से ग्रस्त गर्भवतियों का प्रसव कराना काफी जोखिम भरा होता है। अस्पताल में बेहतर सुविधा न होने से जटिल मामलों में गर्भवतियों को हायर सेंटर रेफर करना डॉक्टर्स की मजबूरी है।

कई सालों से खाली पड़ा है बाल रोग विशेषज्ञ का पद
अल्मोड़ा। महिला अस्पताल में सीएमएस के अलावा महिला डाक्टरों के सात पद सृजित हैं लेकिन अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ का पद कई बरसों से खाली है। प्रसव के बाद नवजात के  उपचार के लिए अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ होना जरूरी है।

निश्चेतक डॉक्टर के बगैर ऑपरेशन से डिलीवरी नहीं हो सकती है लेकिन अस्पताल में करीब तीन साल से निश्चेतक डॉक्टर का पद खाली है। जिला और बेस अस्पताल से निश्चेतक डॉक्टर बुलाकर ऑपरेशन किए जाते हैं। महिला अस्पताल में सीएमएस समेत तीन पदों पर रेगुलर डॉक्टर और संविदा पर तीन विशेषज्ञ महिला डॉक्टर हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञ का एक पद भी लंबे समय से खाली है। 

50 लाख में लग सकती है एसएनबीसीयू
साधारण एसएनबीसीयू मात्र 50 लाख रुपये में ही स्थापित की जा सकती है। यदि सरकार जिले में यह सुविधा मुहैया करा दे तो हर साल सैकड़ों महिलाओं को यहां से हल्द्वानी अस्पतालों के लिए रेफर नहीं होना पड़ेगा।
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