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नहीं हुआ घोटाला, बाबुओं की गलती से उत्तराखंड हुआ शर्मसार

Sat, 18 Jul 2015 11:49 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
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आपदा राहत घोटाला सामने आने के बाद न सिर्फ राज्य में बल्कि देश भर में इसकी भर्त्सना हुई। सकते में आई राज्य सरकार ने इसकी जांच मुख्य सचिव को सौंप दी। लेकिन जांच की रिपोर्ट जब सामने आई तो मामला कुछ और ही निकला।
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जांच रिपोर्ट में सामने आया कि आपदा राहत में हुई गड़बड़ी कोई घोटाला नहीं बल्कि लिपिकीय त्रुटि है। शुक्रवार को जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए मुख्य सचिव एन रविशंकर ने यह जानकारी दी। सीएस के मुताबिक जांच में भुगतान में किसी तरह की कोई अनियमितता सामने नहीं आई।

साथ ही उन्होंने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत उजागर हुए आपदा राहत घोटाले के मामले को क्लीन चिट दे दी।

उन्होंने कहा कि इस त्रुटि की जिम्मेदारी तय करने और प्रशासनिक कार्यवाही करने का अधिकार मंडलायुक्त गढ़वाल और कुमाऊं को दिया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष से भी आग्रह किया है कि आपदा प्रबंधन के मामलों को लेकर सर्वदलीय समिति का गठन किया जाए जो स्थलीय निरीक्षण करे और सरकार को सुझाव भी दे।
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बाबुओं की गलती ने बना द‌िया इसे घोटाला

शुक्रवार को सचिवालय में जांच रिपोर्ट की जानकारी देते हुए मुख्य सचिव ने कहा कि लिपिकीय त्रुटि के कारण सूचना के अधिकार में गलत सूचनाएं दी गई। इससे सूचना आयुक्त ने यह निष्कर्ष निकाला कि आपदा राहत में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है।

उन्होंने बताया कि एक जून 2015 को मुख्यमंत्री के निर्देश पर आपदा राहत घोटाले की जांच शुरू की गई थी। जांच में सहयोग के लिए संबंधित विभागों के सचिवों की समिति बनाई गई थी।

उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और पिथौरागढ़ के जिलाधिकारियों से तथ्यात्मक रिपोर्ट ली गई। 30 जून को मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी गई। मुख्य सचिव के मुताबिक जांच रिपोर्ट के आधार पर मुख्यमंत्री ने जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की संस्तुति स्वीकार कर ली है। जांच रिपोर्ट विभागीय वेबसाइट पर सोमवार तक अपलोड कर दी जाएगी।


प्रदेश सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष से सर्वदलीय समिति का गठन करने का आग्रह भी किया है। सर्वदलीय समिति से यह भी अपेक्षा की गई है कि समिति 2013 की आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों से विवरण हासिल करे। स्थलीय निरीक्षण करे और आपदा प्रबंधन में सुधार के लिए संस्तुति दे।

सूचना आयुक्त ने उठाई थी यह गंभीर आपत्तियां

- मांसाहार किया गया। आपदा के समय में पिकनिक मनाई गई।
- आधा किलो दूध की कीमत 194 रुपये बताई गई
- मोटरसाइकिल में डीजल भरवाने का बिल पाया गया
- हेलीकाप्टर से फंसे यात्रियों को निकालने का बिल 98 लाख
- रुद्रप्रयाग में अधिकारियों के रहने और खाने पर 25.19 लाख का भुगतान
- पर्यटक आवास गृह कुमाऊं मंडल के लाखों रुपये के बिल मानवता को शर्मसार/कलंकित करने वाले हैं।

यह था मामला
आरटीआई के तहत दून निवासी भूपेंद्र कुमार ने प्रशासन से आपदा राहत का पूर्ण विवरण मांगा था। जब यह जानकारी पूरी नहीं मिली तो मामला राज्य सूचना आयुक्त तक पहुंचा।

राज्य सूचना आयुक्त अनिल कुमार शर्मा ने आपदा राहत के मामले में आपदा प्रबंधन पर तल्ख टिप्पणी की। आयुक्त ने मामले की सुनवाई करते हुए यह साफ कहा कि आपदा राहत कार्य में मिली जानकारी किसी बड़े घोटाले की तरफ इशारा कर रही है।

अधिकारियों ने मनमर्जी की और ऐसा लग रहा है कि अधिकारी राहत के लिए नहीं गए थे बल्कि पिकनिक मना रहे थे। आयुक्त ने सीबीआई जांच का आग्रह सरकार से किया था। इस पर विपक्ष ने हो हल्ला मचाया तो मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुख्य सचिव को आरटीआई में उठे बिंदुओं पर जांच करने का निर्देश दिया था।
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जांच रिपोर्ट में यह निकलकर आया सामने

आपदा के अवसर पर मांसाहारी पदार्थों का सेवन किया गया। राहत दल में सेना के लोग भी शामिल थे। इनके यहां मांसाहार की परंपरा है। विषम परिस्थितियों में मांसाहार को अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। इसको पिकनिक मनाना परिभाषित करना उचित नहीं है।

आधा किलो दूध तरल नहीं बल्कि पाउडर दूध था। आरटीआई में सूचना देते समय यह स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाया गया। तहसील कपकोट का यह मामला पिंडारी ट्रैक में फंसे 47 लोगों को निकालने का है। राजस्व निरीक्षक ने 25 किलोमीटर पैदल चलकर इस दूध को पहुंचाया, ऐसे में यह छोटी सी गलती संभव है।

वाहन यूए 07ए 0881 में 25 लीटर डीजल भरवाना दर्शाया गया जो की एक मोटरसाइकिल का नंबर है। वास्तव में यह वाहन  यूए 07 टीए 0881 है जो एक टैक्सी का नंबर है।

बचाव कार्य में जरूरत को देखते हुए यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने के लिए हेलीकॉप्टर की ट्रिप और यात्रियों की संख्या तो है पर यात्रियों के नाम नहीं है। जिलाधिकारियों ने बताया कि आपदा बचाव कार्य में इतना समय नहीं था कि यात्रियों के नाम पते भी लिखे जाते। हालांकि इस खर्च में अनियमितता नहीं पाई गई।

मामला कैलास रेंसीडेंसी गुप्तकाशी का है। वास्तविक रूप से भुगतान 4000 रुपये प्रति कमरा प्रति दिन का हुआ। जरूरी वस्तुओं की कमी होने पर खाने-पीने के बिलों को अनुचित बताया जाना सही नहीं होगा।
एक लाख रुपये का भुगतान वायुसेना के अधिकारियों के हिसाब से अनुचित व्यय नहीं है।
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