गोपेश्वर के बांवला गांव में 24 जुलाई को आई बाढ़ से कई लोगों को भवन टूट गए थे, जिससे वे टेंट में जीवन यापन कर रहे हैं। ग्रामीण वर्ष 2010 से विस्थापन की मांग कर रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन इस पर ध्यान नहीं दे रहा है।
बीती जुलाई में हुई बारिश से बांवला गांव में 13 भवन पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हो गए थे, जबकि कई भवनों पर दरारें पड़ गई थी। छीड़ा तोक में चटख धूप खिलने पर भवनों में दरारें पड़ रही है। वर्ष 2010 में तत्कालीन जिलाधिकारी डा. रंजीत सिन्हा ने गांव में जाकर गांव को विस्थापन करने का आश्वासन दिया था, लेकिन तीन साल बाद भी गांव का विस्थापन नहीं हो पाया है।
केस एक-
जुलाई में छीड़ा तोक में जमुना देवी का 10 कमरों का भवन क्षतिग्रस्त हो गया था, जिससे वह अब किराए के भवन में जीवन यापन कर रह रहे हैं। शनिवार को डीएम कार्यालय पहुंची जमुना का कहना है कि आपदा ने हमारा सब कुछ छीन लिया है। अब सरकार का मुंह ताकने के सिवा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है।
केस दो-
बांवला गांव की अंजू देवी का कहना है कि गांव के सभी पैदल मार्ग क्षतिग्रस्त पड़े हैं। तीन पैदल पुल भी बह गए हैं, जिससे बच्चों को गदेरा पार करके स्कूल जाना पड़ रहा है। आपदा के तीन माह बाद भी गदेरों में वैकल्पिक पुलों की व्यवस्था नहीं की गई है, जबकि डीएम कार्यालय में पूर्व में ही प्रार्थना पत्र देकर गदेरों पर पुल निर्माण की मांग की गई है।
केस तीन-
गांव के 60 वर्षीय उमतू लाल का कहना है कि बच्चे नौकरी के लिए बाहरी क्षेत्राें में हैं, जिससे घर के आवश्यक सामान के लाने के लिए उन्हें स्वयं ही पांच किमी की पैदल दूरी पार कर छिनका और चमोली बाजार तक आना पड़ रहा है। गांव के पैदल रास्ते क्षतिग्रस्त पडे़ हैं।