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डीए कम मिल रहा या ज्यादा, पता नहीं

Sun, 26 Oct 2014 10:09 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
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केंद्र के आधार पर डीए घोषित करने की सालों पुरानी परंपरा से उत्तराखंड सरकार राहत में है और प्रदेश का वित्त महकमा भी चैन की बंसी बजा रहा है। न महंगाई दर की चिंता करनी पड़ रही है और न कर्मचारी ही यह कह रहे हैं कि हमें ज्यादा दिया या कम।
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महंगाई को काबू करने के लिए हमेशा दबाव
केंद्र सरकार पर महंगाई को काबू करने के लिए हमेशा दबाव रहता है। पर राज्य सरकार इससे बिल्कुल ही अछूती रहती है। हाल यह है कि केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय की ओर से सितंबर 2014 के अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड का उपभोक्ता उत्पाद सूचकांक (सीपीआई) इंडेक्स 140.7 है।

महंगाई का आंकलन करने के लिए इसी सूचकांक का सहारा भी लिया जाता है। पंजाब में यह दर 139.7 है और हिमाचल में 140.2 है। हरियाणा के लिए सीपीआई 140.8 है और उत्तरप्रदेश के लिए 146.7, दिल्ली के लिए 141.6 है। जाहिर है कि पंजाब और हिमाचल से ज्यादा महंगा उत्तराखंड साबित हो रहा है।
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दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की तुलना में उत्तराखंड में महंगाई कम है। सीपीआई का राष्ट्रीय औसत 145 है और यह उत्तराखंड से ज्यादा है। जाहिर है कि प्रदेश सरकार प्रदेश में केंद्र से पैरिटी के नाम पर कर्मचारियों पर मेहरबान है।

शासन का कहना है कि डीए तय करने की प्रक्रिया जटिल है पर सांख्यिकी निदेशालय के अधिकारी कह रहे हैं कि यह काम किया जा सकता है। विशेषज्ञों की माने तो डीए का राज्य स्तर पर आकलन न करने के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं।

डीए घोषित होता तो कम-ज्यादा का सवाल भी उठता। प्रदेश सरकार को यह भी स्पष्ट करना पड़ता कि महंगाई पर काबू पाने के लिए क्या-क्या उपाय किए। इस समय यह सारी कवायद ठंडे बस्ते में हैं।

कैसे निकाला जाता है डीए
डीए का आकलन करने के लिए उपभोक्ता उत्पाद सूचकांक (सीपीआई) की जरूरत होती है। केंद्र सरकार साल में दो बार डीए घोषित करती है। एक जनवरी और दूसरा जुलाई में।

जनवरी मे डीए घोषित करने के लिए पिछले 12 महीनों के सीपीआई का औसत लिया जाता है। आधार वर्ष 2006 को मानते हुए डीए की गणना की जाती है। राज्यों के लिए सीपीआई केंद्र की ओर से जारी होते हैं। मसलन उत्तराखंड के लिए ही सितंबर 2014 का सीपीआई 140.7 है।

राज्य के लिए सीएपीआई इंडेक्स जारी करना बेहद कठिन काम है। हर मंडी के लिए आंकड़ें जुटाने होंगे। फिर डीए का निर्धारण केंद्र के आधार पर करने का निर्णय राज्य गठन के समय ही हो गया था। अधिकतर राज्य इस समय पै पेरिटी को ही मान रहे हैं। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने डीए देने में केंद्र की समकक्षता को स्वीकार नहीं किया है।
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- इंदु कुमार पांडे, वित्त सलाहकार
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