उत्तराखंड पुलिस जंग लगे अपने हथियारों से जंग लड़ रही है। लेकिन मासूम लोगों और खुद को अपराधियों से बचाने की और अपराधियों को पकड़ने की इस जंग में पुलिस नाकाम साबित हो रही है। ये वाकये इस बात की दस्दीक कर रहे हैं।
15 दिसंबर 2014। बागपत में भूरा को ले जा रही देहरादून पुलिस की टीम पर कुछ बदमाशों ने हमला किया। आंखों में मिर्च झोंक तीन हथियार लूट लिए गए। एक सिपाही ने अपनी एके 47 किसी तरह बचा ली। भागते बदमाशों पर निशाना लगाने के लिए उसने राइफल तानी, लेकिन ट्रिगर दबाने से पहले ही मैगजीन टूटकर अलग गिर पड़ी।
18 जनवरी 2015। दून पुलिस लाइन में कई बैंकों के निजी सुरक्षाकर्मी जुटे, भूरा की फरारी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बैंक लूट के मद्देनजर उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया गया। लेकिन, सुरक्षाकर्मियों ने बंदूकें थामीं तो इनमें से अधिकतर खुली ही नहीं। प्रशिक्षक भी नाकाम रहे, मजबूरन दूसरे हथियार मंगाए गए।
डेढ़ महीने के भीतर के ये दो वाकये बताते हैं कि अपराध की रोकथाम और अपराधियों से निपटने का दावा करने वाली उत्तराखंड पुलिस ‘मुकाबले’ के लिए कितनी तैयार है।
हाल में जीलॉक पिस्टल समेत कई अंतरराष्ट्रीय स्तरीय हथियारों की खरीद करने वाली उत्तराखंड पुलिस पहले से मौजूद हथियारों के रखरखाव के लिए कितनी सजग है, यह भी इन मामलों से साफ हो जाता है। बड़ा सवाल यह भी है कि हथियार चलाए कहां जाएं?
सेना की फायरिंग रेंजों के ही भरोसे पुलिस
राज्य गठन के 14 साल बाद भी प्रदेश पुलिस अपनी कोई फायरिंग रेंज नहीं बना सकी है। प्रशिक्षण और अभ्यास के लिए पुलिस सेना की फायरिंग रेंजों के ही भरोसे रहती है। लेकिन ऐसे मौके कम ही मिलते हैं। ऐसे में हथियार रखे-रखे खराब हो रहे हैं।
देहरादून, टिहरी और हरिद्वार में फायरिंग रेंज का काम वर्षों से चल रहा है। लेकिन किसी की जिम्मेदारी तय न होने के कारण काम की चाल बेहद सुस्त है। हैरत की बात यह है कि इन फायरिंग रेंज को कब तक तैयार किया जाना है, यह लक्ष्य भी तय नहीं किया गया है।
सेना देखती है अपनी सुविधा
पुलिस जवानों को प्रशिक्षण या अभ्यास कराने के लिए फायरिंग रेंज चाहे तो सेना से गुहार लगानी पड़ती है। लेकिन सेना अपनी सुविधा, उपलब्धता के हिसाब से ही रेंज देती है। इसकी वजह से बैंक सुरक्षाकर्मियों और निजी लाइसेंसी हथियार रखने वालों को प्रशिक्षण देने की योजना अधर में है।
11.5 हजार जवान कतार में
प्रदेश के साढ़े 11 हजार जवानों को इस वर्ष फायरिंग अभ्यास का इंतजार है। वित्तीय वर्ष 2014-15 समाप्त होने में अब सिर्फ दो माह रह गए हैं, लेकिन फायरिंग के लिए कोई कार्ययोजना अब तक तय नहीं हो सकी है।
हालांकि पुलिस अधिकारियों का दावा है कि इस साल करीब सात हजार पुलिसकर्मियों को फायरिंग अभ्यास कराया जा चुका है।
बढ़ रही संवेदनशीलता
उत्तराखंड में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुख्यात बदमाशों सुशील मूंछ, संजीव उर्फ जीवा, सुनील राठी, राहुल खट्टा और अमित उर्फ भूरा की गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। इससे प्रदेश अपराधों के लिहाज से संवेदनशील हो गया है। ऐसे में पुलिस को और प्रशिक्षित और अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस किए जाने की जरूरत है।
बम निरोधक दस्ता, गुलदार भी फेल
हाल में महानिदेशक बीएस सिद्धू द्वारा ली गई परीक्षा में बम निरोधक दस्ता और गुलदार भी फेल साबित हुआ है। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए गए ये दोनों सेल अभी पूरी तरह तैयार नहीं है।
महानिदेशक दोनों दस्तों का प्रदर्शन देखकर खासे नाराज हुए थे। अब इन दस्तों से जुड़े जवानों को नए सिरे से प्रशिक्षण देने की तैयारी है।
पुलिसकर्मियों के नियमित अभ्यास के लिए अधिकारी गंभीर हैं। नियमानुसार हर साल एक तिहाई पुलिसकर्मियों को फायरिंग कराने का प्रावधान है, लेकिन प्रदेश में हर सिपाही के लिए यह व्यवस्था की कोशिश रहती है। बचे हुए जवनों को जल्द ही फायरिंग करा दी जाएगी। पुलिस को नियमित रुप से हथियारों की सफाई किए जाने के निर्देश है। देहरादून, टिहरी और हरिद्वार की फायरिंग रेंज भी जल्द बनकर तैयार हो जाएगी।
- राम सिंह मीणा, अपर पुलिस महानिदेशक, कानून व्यवस्था