उत्तराखंड को अलग करने की मांग के पीछे बड़ी वजह पहाड़ के युवाओं को रोजगार न मिलना और पलायन रही। लेकिन राज्य बनने के 13 साल बाद ये समस्याएं घटी नहीं और विकराल होती गईं।
नौकरी की बाट जोह रहे
आज स्थिति यह है कि पहाड़ पर गांव के गांव खाली होकर खंडहर हो रहे हैं, जबकि सात लाख से अधिक युवा आज भी नौकरी की बाट जोह रहे हैं। राज्य बनने के बाद पहाड़ों में पूंजी निवेश और बेरोजगारी की स्थिति चौंका देने वाली है।
उद्योग निदेशालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में अब तक 7739 करोड़ का पूंजी निवेश हुआ और 1,59,660 लोगों को रोजगार मिला, लेकिन पर्वतीय जिलों की स्थिति दयनीय है। पहाड़ी जनपदों में रुद्रप्रयाग में 827 उद्योग लगे, जिनमें 2137 लोगों को रोजगार मिला।
इसी तरह चंपावत में 752 उद्योगों में 1665 युवाओं को रोजगार मिला। जबकि बागेश्वर में 716 उद्योग लगे और 1510 लोगों को रोजगार मिला। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, पौड़ी, टिहरी, चमोली और उत्तरकाशी में बेरोजगारी का आंकड़ा 30 हजार से 60 हजार तक है।
मंत्री, अफसर रहे सैर पर
राज्य गठन के बाद पर्वतीय जिलों की पूरी तरह अनदेखी हुई। थोड़ा बहुत विकास जो हुआ वह मैदानी जिलों हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर और देहरादून तक ही सिमटकर रह गया। जनता विकास को तरसती रही और इन 13 वर्षों में मंत्री और अफसर विदेशों की सैर करते रहे।
पर्वतीय जिलों में बेरोजगारी का हाल
जिला - बेरोजगार
अल्मोड़ा - 63949
नैनीताल - 70343
पिथौरागढ़ - 52840
बागेश्वर - 25202
चंपावत - 19132
टिहरी - 53643
उत्तरकाशी - 30895
पौड़ी - 63399
चमोली - 34295