केदारनाथ में माइनस आठ के तापमान और बर्फ के बीच जान जोखिम में डालकर काम करने वाले कर्नल के कंमाडो जांबाज हैं।
एक साल में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल ने कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़कर ये टीम तैयार की है। इटली के फ्रेंको से लेकर दोनों पैरों से लाचार शैलेंद्र की इस टीम का ही जज्बा है कि गौरीकुंड से लेकर केदारनाथ तक का रास्ता तैयार है।
आठ फीट बर्फ के बावजूद केदारनाथ में करीब 1800 लोगों केरहने का इंतजाम हो गया है। इन लोगों को अधिक वेतन की चाह नही है और घर परिवार से दूर रहना भी मंजूर है। कई तो ऐसे है जो आठ-आठ महीने से घर ही नहीं गए।
उत्तरकाशी में बस गए पर मूल रूप से इटेलियन फ्रेंकों को ही लीजिए। फ्रेंको केदारनाथ में एक साल से हैं। वेल्डिंग और पलंबिंग का काम जानते हैं। केदारनाथ में निर्माण के लिए वेल्डिंग और पेयजल आपूर्ति के लिए पाइपलाइन की जरूरत पड़ी तो फ्रेंको कर्नल कोठियाल की टीम से जुड़ गए। अब फ्रेंकों स्किल डेवलपमेंट का काम भी कर रहे है। आसपास के करीब सौ युवाओं को वे इस काम में प्रशिक्षित कर रहे हैं।
कर्नल ने टटोले अपने कंमाडो के दिल
केदारनाथ में पुनर्निर्माण के काम को अंजाम देने के लिए कर्नल ने अपने कंमाडो के दिलों को टटोला। कर्नल की भावना से प्रेरित होकर उत्तरकाशी के आमोद पंवार इस टीम के साथ एक साल से जुड़े है।
आपदा 2013 में नया बना होटल गंवा देने वाले आमोद की उपस्थिति केदारनाथ में भी दिखती है तो शासन के काम के लिए दून के सचिवालय में भी। आमोद अपने काम को कोई नाम नहीं देते पर उनकी उपस्थिति मशीन में ग्रीस की तरह रहती है।
केदारनाथ में आर्किटेक्ट की भूमिका में है दिनेश उनियाल।
दिल्ली की नौकरी छोड़कर केदारपुरी पहुंचे दिनेश मकानों के डिजायन से लेकर लैंडस्केप मैपिंग तक का काम करते हैं। दिनेश के मुताबिक इस काम में सकून है। दिल्ली में पैसा था पर सकून नहीं। केदारनाथ में जून 2013 की आपदा के बाद केवल विध्वंश ही बचा था। इस विध्वंश का नामो निशान मिटाने का काम कर रहे हैं डिमोलिशन इंचार्ज राजेश जोशी और संजय कोठियाल। कोठियाल केमुताबिक यह उनके लिए इस बड़े यज्ञ में आहुति है।
केदारनाथ में जेसीबी, पोर्कलैंड, ट्रेक्टर जैसी भारी मशीन पहुंची तो कर्नल की टीम को बाकायदा एक वर्कशॉप भी बनानी पड़ी। निम से प्रतिनियुक्ति पर कर्नल के साथ आए देवेंद्र हैं जो इस सेक्शन के इंचार्ज है। देवेंद्र मशीनों की देखभाल करने के अलावा कर्नल को पूरी घटनाओं और काम का लेखा जोखा देने का काम भी करते हैं।
केदारनाथ की ओर जाते समय अगर रास्ते में ग्लेश्यिर के बीच से गुजरना पड़े तो याद रखिए कि यह मेहनत पदम साही और दिनेश रावत की है। पदम साही के जिम्मे रामबाड़ा से लेकर लिंचौली तक का रास्ता है। दिनेश रावत छानी कैंप से केदारनाथ तक की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं।
अगत्स्यमुनि से लेकर सोनप्रयाग भी सजी है सेना
केदारनाथ में पहुंचने पर अगर एक युवक आपको आपदा की आपबीती सुनाता मिले तो समझ लीजिए कि वह भी कर्नल की टीम का कंमाडो है। 16-17 जून को केदारनाथ में आपदा से बच गए विनय तिवाड़ी केदार की टैंट कालोनी के इंचार्ज भी हैं और टूर गाइड भी। इस टीम में आपको जानी भी मिलेगा जो केदारनाथ में हर किसी के बाल काटने का काम करता है। भमसिंह टेलर भी आपको यहां मिलेगा।
सोनप्रयाग में दोनो पांवों से लाचार पर जज्बे वाला युवक अगर आपको दिखाई दे तो समझे की वह भी कर्नल का सिपाही है। उखीमठ का शैलेंद्र सोनप्रयाग में पंकज, अनूप आदि के साथ अकाउंट पर काम करता है।
सोनप्रयाग में बेस कैंप हैं और यहां से करीब दो सौ मजदूर हर रोज केदारनाथ सामान ले जाने का काम भी करते हैं। नारायणकोटी में कर्नल की टीम के कई सिपाही मौजूद हैं। अरुण तिवारी यहां पर जरूरी सूचनाओं का आदान प्रदान से लेकर और भी कई काम करते हैं।
कर्नल की इस टीम को अपर मुख्य सचिव राकेश शर्मा तक अपनी टीम कहते हैं। राकेश शर्मा एक कड़ी हैं जो केदारनाथ को सीधे देहरादून से भी जोड़ती है। इस टीम का एक सिरा अब रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन भी है। रुद्रप्रयाग जिला आपदा प्राधिकरण घोषित हो चुका है और निम इसकी कार्यदायी संस्था।