उत्तराखंड के मौजूदा डीजीपी बीएस सिद्धू द्वारा देहरादून के वीरगिरवाली गांव में स्थित वन्य आरक्षित क्षेत्र में प्लॉट खरीदने, लैंड यूज बदलने और अवैध तरीके से साल वृक्षों की कटान के चर्चित मामले में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने डीजीपी ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने जो जमीन खरीदी थी वह वन्य आरक्षित क्षेत्र के दायरे में है। हालांकि जमीन खरीदते वक्त इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। उन्हें जमीन की जानकारी मेरठ (यूपी) जिले के कुछ वकीलों के जरिये हुई थी और जमीन बेचने वाले नत्थूराम से वे कभी नहीं मिले।
जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने डीजीपी के इस जवाब पर फटकार लगाई और कहा कि जमीन खरीदते वक्त वन्य क्षेत्र की जानकारी हासिल करना आखिर किसकी जिम्मेदारी थी। याचिकाकर्ता नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बार एसोसिएशन की ओर से क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान वरिष्ठ एडवोकेट राज पंजवानी ने जीडीपी से पूछा कि क्या आप जानते हैं कि प्रत्येक साल वृक्ष की कीमत छह लाख रुपये है?
इस पर डीजीपी सिद्धू ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है। प्लॉट के बदले दिए गये भुगतान को लेकर एक सवाल पर डीजीपी सिद्धू ने ग्रीन बेंच को बताया कि प्लॉट खरीदने के लिए तीन चेक नत्थूराम को दिए गये थे।
इनमें दो कैश हुए थे एक कैश नहीं हो पाया था। डीजीपी ने कहा नत्थूराम से 20 नवंबर 2012 में जमीन खरीदी थी जबकि आरोप है कि नत्थूराम की मौत 1983 में हो गई। इस संबंध में डीजीपी ने कहा कि उन्हें कोई जानकारी नहीं है।
डीएफओ पर आरोप
मसूरी डिवीजन के फॉरेस्ट ऑफिसर धीरज पांडेय की ओर से पेश काउंसिल ने भी डीजीपी सिद्धू का क्रॉस एग्जामिनेशन किया। दरअसल, डीजीपी ने अपने हलफनामे बताया था कि पेड़ों के कटने के संबंध में धीरज पांडेय समेत अन्य अधिकारियों का भी हाथ है। फॉरेस्ट डिपार्टमेंट कई डॉक्यूमेंट पुराने तारीख में तैयार कर मेरे खिलाफ साजिश रच रही है।
खतौनी में बंजर थी जगह
डीजीपी ने एक सवाल पर बताया कि जब जमीन खरीदी तो खतौनी में संबंधित प्लॉट बंजर था। इस पर काउंसिल ने पूछा कि क्या खतौनी झूठी थी। या फिर आपने फॉरेस्ट रिजर्व एरिया में संबंधित प्लॉट पर पेड़ ही नहीं थे। डीजीपी ने कहा कि खतौनी झूठी नहीं बल्कि लंबे समय से अपडेट नहीं थी।
वहीं, काउंसिल ने ग्रीन बेंच को बताया कि वन्य क्षेत्र में स्थित प्लॉट के सीमांकन के आवेदन को भी फॉरेस्ट रिजर्व एरिया होने के कारण निरस्त कर दिया गया था। इस पर डीजीपी ने कहा कि निरस्त करने का आधार फॉरेस्ट रिजर्व एरिया नहीं बल्कि कुछ और थे।
क्या साल वृक्ष को पहचान सकते हैं?
क्या आपने बतौर डीजीपी पेड़ों के कटने की सूचना को लेकर किसी तरह का कोई कदम उठाया? इस पर डीजीपी ने कहा, नहीं। डीजीपी ने कहा कि पेड़ों के कटने की सूचना भी उन्होंने ही दी थी। उनके पिता आईपीएस अधिकारी थे। वे भी पेड़ों से बहुत लगाव रखते थे मैं भी रखता हूं।
मैंने पेड़ नहीं काटे हैं। इस पर बेंच ने पूछा कि जब आपने साल वृक्षों को प्लॉट पर देखा पूरा इलाका पेड़ों से भरा था फिर आपने जमीन क्यों खरीदी? क्या आप साल वृक्ष को पहचान सकते हैं। इस पर डीजीपी ने कहा हां वे साल वृक्षों को पहचान सकते हैं। क्रॉस एग्जामिनेशन आज भी किया जाएगा।
फैक्ट फाइल
आरोप है कि उत्तराखंड के मौजूदा डीजीपी बीएस सिद्धू ने देहरादून में 20 नवंबर 2012 में घोषित वन्य आरक्षित क्षेत्र में नत्थूराम नाम के काल्पनिक व्यक्ति से फर्जी तरीके से प्लॉट जमीन खरीदा और 13 मार्च 2013 को संबंधित क्षेत्र का लैंड यूज बदला साथ ही वन्य क्षेत्र में मौजूद कीमती साल वृक्षों को अवैध तरीके से कटवाया है।
उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने काउंटर एफिडेविट दाखिल कर एनजीटी को बताया है कि 22 फरवरी 1968 को ढाक पट्टी गांव में प्लाट नंबर 3/1 (15.23 एकड़) और 1 मई 1970 को वीरगिरवाली गांव में प्लॉट नंबर 1/1 (3.86 एकड़) को विस्तृत तौर पर जारी की गई अधिसूचना में फॉरेस्ट रिजर्व एरिया घोषित किया गया था।
09 मार्च 2013 को मसूरी फॉरेस्ट डिवीजन के स्टाफ ने संबंधित क्षेत्र में अवैध तरीके से 4 साल वृक्षों के कटने की सूचना पाकर उन्हें सीज किया था, इसके बाद दोबारा 18 मार्च 2013 को 21 अन्य साल वृक्षों के अवैध तरीके से कटने की सूचना मिली और उसी दिन जांच शुरू की गई और पाया गया कि यह जमीन बीएस सिद्धू ने खरीदी है।
डिवीजन फॉरेस्ट ऑफिसर ने भी इन्हीं आरोपों के साथ सिद्धू के विरुद्ध काउंटर एफिडेविट दाखिल किया था।