देहरादून में ऐसे कई शिक्षक मौजूद हैं, जिन्होंने अपने-अपने तरीके से शिक्षा जगत को एक नई रोशनी दी। शिक्षक दिवस पर अमर उजाला आपको ऐसे शिक्षकों के बारे में बताने जा रहा है। जिन्होंने अपने प्रयासों से छात्रों की जिंदगी बदल दी।
यहां बच्चे हैं मार्कोनी और एडिसन
राजधानी के केंद्रीय विद्यालय ओएलएफ में प्राथमिक शिक्षक नरेंद्र बिष्ट ने बच्चों को सिखाने का नया तरीका ईजाद किया है। नरेंद्र बिष्ट हर बच्चे का नाम किसी वैज्ञानिक के नाम पर रख देते हैं।
सुबह कक्षा में जब वह हाजिरी लेते हैं तो रजिस्टर में नाम या नंबर बोलने के बजाए वह वैज्ञानिक का नाम बोलते हैं। जिस बच्चे का नाम उस वैज्ञानिक के नाम पर होता है, वह तुरंत उसकी खोज के नाम के तौर पर जवाब देता है।
मसलन, शिक्षक ने बोला, मार्कोनी तो बच्चा जवाब देगा रेडियो। इसी प्रकार अगर शिक्षक ने बोला रामायण तो बच्चा बोलेगा महर्षि बाल्मिकी। पढ़ाने के इस नए तरीके का बच्चों पर काफी अच्छा असर नजर आया है।
कई बच्चे प्राथमिक से जूनियर कक्षाओं में पहुंचते ही सामान्य ज्ञान की क्विज में अपना नाम चमका चुके हैं। नरेंद्र बिष्ट बिना किसी स्वार्थ के इस तरीके से छात्रों को पढ़ा रहे हैं। इसकी शुरुआत वह देश और राजधानी से करते हैं।
फिजिक्स को बना दिया जिंदगी
दून इंटरनेशनल स्कूल के भौतिकी के शिक्षक दिनेश बड़थ्वाल का बच्चों को पढ़ाने का तरीका भी जुदा है। आमतौर पर बच्चों में खौफ बनने वाली फिजिक्स को उन्होंने बेहद आसान बना दिया है। मसलन, हम चलती गाड़ी में ब्रेक लग जाने पर आगे की ओर क्यों झुक जाते हैं, के सवाल को वह जड़त्व के नियम के आधार पर बता देते हैं।
वर्ष 2011 में ‘सीबीएसई नेशनल अवॉर्ड’ विजेता रहे दिनेश बड़थ्वाल ने बताया कि उनका मकसद फिजिक्स की मुश्किलों को दूर कर डेली लाइफ का हिस्सा बनाना है।
मसलन, बाथरूम में फ्लश ऑन करते हैं तो पानी छोटे-छोटे छिद्रों से बाहर आता है, इसके पीछे की फिजिक्स को छात्रों को समझाया जाता है।
खेल-खेल में गणित
केंद्रीय विद्यालय ओएनजीसी के शिक्षक मनोज मलिक को वर्ष 2012 के ‘नवाचार पद्धतियां एवं प्रयोग’ अवॉर्ड से इस वर्ष सम्मानित किया गया है। यह अवॉर्ड उन्हें 2010 में भी मिल चुका है। गणित के यह शिक्षक गणित को खेल-खेल में समझा देते हैं।
इंटरएक्टिव शब्दों, पावर प्वाइंट प्रेजेंटशन का प्रयोग करना तो पुरानी बात हो चुकी है लेकिन इस बार उन्होंने विशेष तौर पर प्लास्टिक शीट का प्रयोग पढ़ाने में किया है। बेहद सस्ती इस तकनीक से बच्चे को प्रोजेक्ट पर सवाल और उनका हल सिखाया जाता है।
मसलन किसी सवाल और उससे जुड़े सभी मैथड़ को 50 पैसे की प्लास्टिक शीट पर लिख दिया जाता है। इस शीट को प्रोजेक्टर के सामने रखते हैं तो यह हर बच्चे तक आसानी से पहुंच जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने गणित को
व्यवहारिक जीवन में समझाने के भी कई आसान तरीके निकाले हैं। मनोज मलिक का कहना है कि उन्हें गणित में नवाचारी प्रयोग करने से बच्चों के दिमाग से गणित का भूत बाहर निकल रहा है।
फेसबुक पर अपनी राय देने के लिए यहां क्लिक करें