क्या है गांव का इतिहास
1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान सीमावर्ती जादुंग और नेलांग गांव को खाली करा दिया गया था। ऐसे में लोग बगोरी गांव में आकर बस गए। जादुंग और नेलांग के लोग उस समय तिब्बत के साथ नमक का व्यापार किया करते थे। जो उस समय आजीविका का मुख्य साधन था। बाद में यहां के लोगों ने सेब की बागवानी की, जो वर्तमान में यहां के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है। गांव में करीब 150 लकड़ी के घर हैं, जो बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं। यह हर्षिल से करीब एक किमी दूरी पर है, जिसके रास्ते में सात छोटे पुल हैं।
ये भी पढ़ें...Uttarakhand Cabinet Decision: कोविड काल में आरटीपीसीआर जांच का एक माह में होगा भुगतान, सरकार ने दी मंजूरी
उत्तरकाशी के हर्षिल के निकट स्थित वाइब्रेंट विलेज बगोरी को हम मॉडल पर्यटन गांव के तौर पर विकसित करेंगे, जिसके लिए जल्द ही एसपीए के साथ एमओयू होने जा रहा है। इससे गांव में पर्यटन की गतिविधियों को और बढ़ावा मिलेगा। -पूनम चंद, अपर निदेशक, पर्यटन