जंगल की रक्षा करते शहीद हुए जांबाजों के गुमनाम किस्से अब भावी वन अधिकारियों के साथ ही हर देशवासी के लिए प्ररेणा बनेंगे।
इन जांबाजों की शहादत को दुनिया के सामने लाने का जिम्मा उठाया है देहरादून स्थित फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) ने। संस्थान में राष्ट्रीय स्तर पर पहला वन शहीद स्मारक बन रहा है।
तस्करों के निशाने पर रहे वनकर्मी
वर्ष 1987 में चंदन तस्कर वीरप्पन ने तमिलनाडु में वन अधिकारी चिदंबरम को ईमानदारी से ड्यूटी करने पर मौत के घाट उतार दिया था।
नवंबर 1991 में वीरप्पन ने बड़ी बेरहमी से आईएफएस अधिकारी पंडिलापल्ली श्रीनिवास की हत्या कर दी थी। उत्तराखंड की मोतीचूर रेंज में अवैध कटान में जुटे तस्करों ने वन कर्मी हरपाल सिंह और नरेश की जान ले ली थी। इन वीरों को वह सम्मान और ख्याति नहीं मिल पाई, जिसके वे हकदार थे।
राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्मारक
एफआरआई में बनने वाला शहीद स्मारक इसी कमी को पूरा करेगा। इस पर देशभर में शहीद हुए 1500 वन कर्मचारियों और अधिकारियों के नाम अंकित होंगे। हालांकि राज्य स्तर पर आंध्र प्रदेश में ऐसा स्मारक है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एफआरआई में पहला स्मारक होगा।
स्मारक के लिए सभी राज्यों से शहीदों के नामों के नाम मांगें गए हैं। एफआरआई परिसर में स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में देशभर के आईएफएस अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाता है। इस लिहाज से भी यह स्मारक अहम माना जा रहा है।
शहादत में मध्य प्रदेश शीर्ष पर
वनकर्मियों की शहादत के मामले में मध्यप्रदेश आगे है। एफआरआई को मिली प्राथमिक सूचना के अनुसार मध्यप्रदेश में आजादी के बाद से अब तक 160 से अधिक वन कर्मचारी शहीद हुए हैं।
आंध्रप्रदेश में 1960 से अब तक यह संख्या 33 बताई गई है। उत्तर प्रदेश में 80 से अधिक और उत्तराखंड वन क्षेत्र में आजादी के बाद से 40 वनकर्मियों ने जंगलों की रक्षा में जान दी। बाकी राज्यों से शहीदों की सूची अभी नहीं मिल पाई है।
आईएफएस एसोसिएशन के देहरादून चैप्टर के अध्यक्ष व फारेस्टर वेलफेयर समिति के पूर्व पदाधिकारी प्रमोद पंत ने एफआरआई की पहल को सराहनीय बताया है।