नरेंद्र मोदी की लहर ने दून को गिरफ्त में ले लिया है। हर तरफ नमो-नमो की चर्चा है। समाजशास्त्रियों की मानें तो लोग किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे हैं।
मोदी बनेंगे तारणहार
निराशा ने आम आदमी के भीतर इस कदर घर कर लिया है कि उनकी यह उम्मीद बेमानी भी नहीं लगती। लेकिन उनका मानना है कि विकल्पहीनता की स्थिति में मोदी उन्हें बेशक तारणहार नजर आ रहे हों, लेकिन अगर उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं तो स्थिति अराजक भी हो सकती है।
समाजशास्त्री विभा सक्सेना का कहना है कि देश में दो बड़ी पार्टियां हैं। एक इस वक्त केंद्र पर काबिज है, लेकिन उसके नुमाइंदों के आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर ढुल-मुल रवैये ने लोगों के भीतर अंधकार भर दिया है।
आशा का संचार
यह सच है कि महंगाई, रोजगार जैसे मुद्दे कोई एक दिन में सुलझने वाले नहीं, लेकिन लोगों को उनकी उम्मीदों के सवाल पर कोई संतुष्टिदायक जवाब तक नहीं मिल रहा। कांग्रेस का दिल्ली चुनाव में हाल इसी असंतोष का परिणाम है।
वह अभी तक पीएम पद का उम्मीदवार तक घोषित नहीं कर पाई है। इस दृष्टि से मोदी के रवैये और उनकी एक अहम पद की तैयारी ने लोगों में एक आशा का संचार तो किया ही है।
समाजशास्त्र की जानकारी रखने वाले अवधेश कुमार के मुताबिक मोदी और राहुल गांधी दोनों को एक स्तर पर प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है, लेकिन लोगों को रिझाने के मामले में मोदी आगे हैं।
वह सहानुभूति हासिल करने की जगह युवाओं को रोजगार, विकास का रास्ता सुझाते नजर आते हैं। अर्थशास्त्री बेशक उनके बारे में कुछ भी राय रखें, लेकिन वह हताशा के माहौल में उम्मीद की किरण तो नजर आ ही रहे हैं।