सचल हिमालयी महाकुंभ के तौर पर जानी जा रही नंदा राजजात यात्रा देश-दुनिया के हजारों भक्तों को अध्यात्म की अलौकित अनुभूतियों से जोड़ने का माध्यम बनी, वहीं पड़ोसी देश नेपाल पर भी मां नंदा की कृपा बरसी।
बोझा उठाने में हुई रिकार्ड कमाई
यात्रा में ट्रैकरों, श्रद्धालुओं का बोझा ढोने वाले नेपाली पोर्टरों ने महज सात दिन में एक करोड़ की कमाई कर डाली। किसी भी यात्रा के दौरान इतनी कम अवधि में बोझा उठाने में हुई इतनी कमाई एक रिकार्ड मानी जा रही है।
नंदा राजजात यात्रा लगभग 18 दिन में पूरी होती है। शुरुआत से शामिल होने वाले श्रद्धालु तो नौटी गांव से ही पैदल चलते हैं, लेकिन देश के दूसरे राज्यों और विदेशों से आने वाले सैलानी वाण गांव से यात्रा में ट्रैकिंग रूट के जरिये जुड़ते हैं।
बेहद दुर्गम रास्ते पर अधिकतर ट्रैकर अपना सामान नेपाली पोर्टरों के हवाले कर देते हैं। सरकारी अनुमान के अनुसार इस बार यात्रा में 1500 नेपाली पोर्टर गए थे।
हर पोर्टर ने वाण से जोरागली होते हुए होमकुंड और वहां से सुतोल तक लौटने में सात दिन की यात्रा पूरी की। प्रति पोर्टर प्रतिदिन का भाड़ा एक हजार रुपये था। इस तरह 1500 पोर्टरों ने सात दिन में एक करोड़ पांच लाख रुपए की कमाई की।
एक साल से थे खाली
नेपाल के महेंद्रनगर निवासी पोर्टर राम बहादुर ने बताया कि वह पहले हिमालय की विभिन्न चोटियों पर चढ़ने वाले पर्वतारोही दलों के साथ जाकर सामान ढोते थे। उम्र 45 की हुई तो स्वास्थ्य कारणों से बर्फ पर जाना छोड़ दिया। इस बीच नंदा राजजात शुरू होने का पता चला तो तुरंत यहां पहुंच गए।
राम बहादुर ने बताया कि यात्रा में अच्छी कमाई हुई। उन्होंने यह भी बताया कि नेपाल से बदरीनाथ-केदारनाथ यात्रा में बोझा ढोने के लिए हर साल बड़ी संख्या में पोर्टर आते थे। लेकिन पिछले साल आई आपदा के बाद से वे खाली हाथ थे। बताया कि राजजात ऐसे सैकड़ों पोर्टरों के लिए रोजी कमाने का जरिया बनी।
खच्चर वालों की भी चांदी
ट्रैकिंग रूट पर खच्चर और घोड़े चलाने वालों ने भी लाखों की कमाई की। खच्चरों पर सवारी का एक दिन का भाड़ा वाण गांव से बेदनी बुग्याल तक 2500 रुपए था। खच्चर संचालक स्थानीय ग्रामीण ही थे। यात्रियों ने तो खच्चरों पर सवारी की ही, सरकारी रसद और यात्रा पड़ावों पर गैर सरकारी संस्थाओं का सामान भी इनके जरिये ही पहुंचाया गया।