श्रीनंदा राजजात के चौथे दिन नंदा ने राजराजेश्वरी के रूप में गढ़वाल और कुमाऊं के संगम की धारा बहाई। कांसुवा के कुंवरों की पूजा-अर्चना स्वीकार कर दोपहर बाद चांदपुर गढ़ी पहुंची नंदा का स्वागत जन सैलाब ने किया।
नंदा यहां राजराजेश्वरी के रूप में पूजी गईं। देर शाम नंदा ने नौ धाराओं के बीच बसे छोटे से गांव सेम में किया। कांसुवा से कुछ दूर महादेव मंदिर पर नंदा की छंतौली को परंपरा का निर्वहन करते हुए नौटी के नौटियाल ब्राह्मणों ने कोटी के ड्यूंडी ब्राह्मणों को सौंपा। अब अंतिम पड़ाव तक छंतौली कोटी वालों के पास ही रहेगी।
नंदा राजजात के रूप में गढ़वाल और कुमाऊं का विराट धार्मिक और सांस्कृतिक संगम चांदपुर गढ़ी में सामने आया। भक्तों का ऐसा रेला लगा कि यातायात की सारी व्यवस्था ही ध्वस्त हो गई।
चार छंतौलियों, दर्जन भर से अधिक वीर और पश्वाओं के साथ चांदपुर गढ़ी में नंदा की छंतौली और चार सींग वाला खाड़ू (मेढ़ा) पहुंचा तो भक्तों की सालों की मुराद भी पूरी हो गई। छंतौली और खाड़ू की एक झलक पाने के लिए गढ़ी में करीब एक लाख लोग उमड़ पड़े।
नंदा की झलक पाने को भीड़ रही बेकरार
गढ़ में दक्षिण काली की पूजा में शामिल होने से ज्यादा बेकरारी नंदा की एक झलक पाने को रही। चांदपुर गढ़ में राजराजेश्वरी के रूप में नंदा जरूर रही हो पर कुंवरों के गांव कांसुवा में नंदा अपने ही स्वरूप में पूजी गईं।
कांसुवा का पुराना गांव वीरान पड़ा है पर थोड़ी दूर हटकर बने नए गांव में करीब 40 कुंवर परिवार पूजा के लिए दिल्ली, मुंबई, देहरादून से आकर डेरा डाले रहे।
कुंवर परिवारों के छोटे से आंगन में पांच छंतौलिया और नंदा के वीर, पश्वाओं सहित आसपास के गांवों से आए दो हजार से ज्यादा लोगों ने नंदा की पूजा की।
सेम में आकर नंदा ने अपना स्वरूप फिर बदल लिया। यहां नंदा को प्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजी गईं। नंदा के पहुंचने पर स्वागत के लिए कर्णप्रयाग से लेकर आसपास के कई गांवों के लोग सेम में पहुंचे। नंदा अब शुक्रवार को दस किलोमीटर दूरी पर स्थित कोटी गांव में अगले पड़ाव पर पहुंचेंगी।
नंदा राज जात में घुल रहा लोक रंग
पहाड़ के खूबसूरत गांवों को एक-दूसरे से पिरोती नंदा अब आगे बढ़ रही है। नंदा की एक ही यात्रा में कई यात्राएं शामिल हो रही हैं। एक ही धारा में कई जलधाराएं। यात्रा का एक रंग राज परिवार की पुरानी रियासत को उकेर रहा है। यहां नंदा राजराजेश्वरी है।
यात्रा का दूसरा रंग लोक रंग है। इसमें हर गांव की अपनी नंदा है। ऐसी नंदा जो उनका ख्याल रखती है। जो कष्टों को दूर करती है। जिसे कष्ट में पड़ा हर व्यक्ति याद करता है और मंगल कामना के लिए पूरा गांव।
एक और नंदा है जो पहाड़ की मातृशक्ति की पहचान है। पहाड़ की अपनी उत्सवधर्मिता को अलग छटा देने वाला लोक का उत्सव तो है ही।
नंदा अब तक यात्रा के तीन पड़ाव पार कर अब ऊंचाई के गांवों की ओर बढ़ रही है। चौथे पड़ाव सेम तक पहुंची नंदा अब एक नया रूप ले रही है। अब वह धन-धान्य की रक्षा करने वाली, सदानीरा नदियों को अपने आंचल में समेटे हिमालय की बेटी है।
नंदा के साथ ही चलते हैं मिथक
हिमालय की विराटता को अब नंदा अपने में समेट रही है। नंदा का यह आध्यात्मिक और प्रकृति से जुड़ा स्वरूप है।
राजकुंवरों ने भी इसी नंदा की पूजा कांसुवा में की। यहां राजाओं की ईष्टदेवी है।
शायद नंदा के लोक स्वरूप को पहचान कर राजाओं ने इसे राजराजेश्वरी का नाम दिया होगा। लोगों के दिलों पर राज करने वाली नंदा राजपरिवार के प्रतीक को और मजबूत कर गई। टिहरी में राजा ने कभी भगवान बदरीनाथ को इसी तरह से पूज कर अपनी सियायत को मजबूत किया होगा।
शांत पहाड़ियों में मन की कल्पनाशीलता को ऊंची उड़ान तो मिल ही जाती है। नंदा की आध्यात्मिक शक्ति में लोक रंग घुला तो कई किंवदंतियों, मिथकों ने जन्म लिया होगा। हर मिथक दुर्गम पहाड़ में रह रहे लोगों को जीने का एक सहारा देता है।
देवी के साथ पहाड़ में हैं उसके वीर
देवी के साथ उसके वीर हैं जो पहाड़ के हर गांव में मौजूद हैं। घंड्याल साथ है जो पहाड़ में करीब-करीब हर जगह मौजूद हैं।
कांसुवा के एक बुजुर्ग के मुताबिक घंड्याल घंटाकर्ण ही है जिसने संकल्प लिया था कि शिव के अलावा किसी और का नाम नहीं सुनेगा। इसके लिए उसने अपने कानों में घंटे लटका लिए थे।
देव भी परेशान तो होते ही हैं
देव हैं तो क्या हुआ। मानव रूप में परेशानी तो होगी ही। नंदा के वीर को भी भीड़ ने आगे बढ़ने नहीं दिया तो वीर को ही सहायता के लिए आगे बढ़ना पड़ा।
एक बुजुर्ग महिला ने कहा भी-अरे, वीर सण अगाड़ी जाण दिया। ऐसे ही कांसुवा में वीर पूजा स्थल से दौड़ता हुआ यह कहते हुए आया-ठंडो-ठंडो। लोगों ने तुरंत वीर को पानी पिलाया।