नैनीताल हाईकोर्ट ने पहाड़ में स्थित कार्यालयों में नियुक्ति के बावजूद कैंप कार्यालयों की आड़ में मैदानी क्षेत्रों में डटे रहने वालों अफसरों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए ऐसे अधिकारियों और कर्मियों का ब्योरा तलब किया है जिन्होंने इसका लाभ लिया है।
21 नवंबर से पूर्व जवाब देने के निर्देश
साथ ही कोर्ट ने बीते 14 वर्षों में पहाड़ में तैनाती न पाने वाले अधिकारियों की सूची भी तलब की है। हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से विभिन्न बिंदुओं पर 21 नवंबर से पूर्व शपथपत्र पत्र दाखिल कर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई के लिए 24 नवंबर की तिथि नियत की गई है।
एक्टिंग चीफ जस्टिस वीके बिष्ट एवं न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की संयुक्त खंडपीठ ने हरिद्वार निवासी मांगेराम सिरोही की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामला बताया।
याचिका में कहा गया था कि विभिन्न विभागों के कार्यालय पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित हैं लेकिन इनके कैंप कार्यालय मैदानी क्षेत्रों में है जिनमें कोई कार्य नहीं किया जाता है। अनेक कर्मचारी जो सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में तैनात किए जाते हैं वे अटैचमेंट के नाम पर सुगम क्षेत्रों में आ जाते हैं।
सुदूर क्षेत्रों में उनकी तैनाती केवल नाम मात्र की होती है। कोर्ट ने इस पर गंभीर रवैया अपनाते हुए मुख्य सचिव से उन कार्यालयों की सूची तलब की है, जिनका मुख्य कार्यालय पर्वतीय क्षेत्रों में है और कैंप कार्यालय मैदानी क्षेत्रों में।
कोर्ट ने उन कर्मियों की संख्या भी मांगी है, जिन्हें बीते पांच वर्षों में इस व्यवस्था का लाभ मिला। साथ ही ए श्रेणी के उन अधिकारियों का विवरण भी तलब किया है, जिन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में तैनाती के बावजूद बीते पांच वर्षों में ऐसे कैंप कार्यालयों में कार्य किया है।
कोर्ट ने मुख्य सचिव से यह भी जानकारी मांगी है कि कितने अधिकारी और कर्मी बीते पांच वर्षों से देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और हल्द्वानी में तैनात रहे हैं। साथ ही ए तथा बी श्रेणी के उन कर्मियों की संख्या भी मांगी है, जो बीते 14 वर्षों में पर्वतीय क्षेत्रों में कभी तैनात नहीं रहे।