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मसूरी में आज भी है स्कॉटलैंड की महक

Sat, 20 Sep 2014 10:06 PM IST
मनमीत रावत/अमर उजाला, देहरादून
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यूके (यूनाइटेड किंगडम) से अलग होने की स्कॉटलैंड की कोशिश भले ही जनमत संग्रह के बाद कामयाब न हो सकी। लेकिन हजारों मील दूर दूसरे यूके (उत्तराखंड) से अलग होने के बाद भी स्कॉटलैंड की महक इसकी वादियों में रची-बसी महसूस होती है।
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मसूरी समेत प्रदेश के पर्वतीय जिलों में बने ब्रिटिशकालीन चर्च और अन्य इमारतें उन स्कॉटिश जवानों की आज भी याद दिलाती हैं, जो ब्रिटिश सेना का हिस्सा बनकर उत्तराखंड पहुंचे थे।

सिर्फ भवन ही नहीं, पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुका मसकबीन भी उत्तराखंड को मिला स्कॉटलैंड का अनूठा तोहफा है। इनके अलावा स्कॉटिश सैनिक पहाड़ के लोगों के प्रति अपने अच्छे बर्ताव के लिए भी जाने जाते थे।
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वरिष्ठ इतिहासकार, विभिन्न विदेशी विवि में अध्यापन कर चुके विजय रावत से बातचीत के आधार पर डालते हैं उत्तराखंड में स्कॉटलैंड की बिखरी यादों पर नजर:

सबसे पहले मसूरी पहुंचीं लेडी हुड

सन 1813 में ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एडमिरल हुड (स्कॉटिश) की पत्नी लेडी हुड कर्नल मैकेंजी और कैप्टन हैरिसन (दोनों सर्वेयर भी थे) के साथ कोलकाता से फतेहपुर होते हुए सहारनपुर पहुंचे।

वहां से ये सभी तिमली गांव होते हुए सहसपुर पहुंचे और वहां से बंदर पूंछ होते हुए मसूरी। यूके की सर्वे जनरल में दर्ज जानकारी के अनुसार तब मसूरी का कोई अस्तित्व नहीं था, न ही इसे यह नाम मिला था।

मसूरी में लेडी हुड और साथियों ने टेक्नोमेट्रिक सिस्टम की मदद से मसूरी की समुद्र तल से ऊंचाई निकाली। भारत में अपनी तरह का यह पहला प्रयोग था।

इस दौरान दल में शामिल रहे कैप्टन यंग ने मसूरी में प्रवास के दौरान कई पेंटिंग भी बनाईं जो आज भी ब्रिटेन के संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। मसूरी में कैप्टन यंग और कर्नल मैकेंजी के नाम पर आज भी सड़कों के नाम हैं। दोनों स्कॉटिश थे।

लंढौर में खुला पहला अस्पताल

मसूरी के लंढौर में पहला अस्पताल ब्रिटिश मेडिकल अस्पताल (बीएमएच) भी स्कॉटिश अधिकारियों ने शुरू किया। दरअसल, गोरखाओं पर जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने मसूरी को बसाया और यहां सैन्य पलटन स्थापित की।

पलटन में स्कॉटिश और आयरिश सिपाही होते थे। तब लंढौर को सिपाही कानवलसीन डिपो (बीमारों का गढ़) कहते थे। अब बीएमएच के स्थान पर सेना का आईटीएम संस्थान है।

इस दौरान स्कॉटिश वास्तुकला आधारित चर्च, बैरक और कई भवन मसूरी में बनाए गए, जो आज भी पहाड़ों की रानी को खास पहचान देते हैं। ऐसे ही भवन नैनीताल, लैंसडौन और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में बनाए गए हैं।

मसकबीन बना पहाड़ की पहचान

उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य ढोल दमऊ की थाप मसकबीन की तान के बिना अधूरी लगती है। लेकिन शायद पहाड़ पर मसकबीन की धुनों पर थिरकने वाले कम ही लोग जानते होंगे कि यह अनूठा वाद्य भी उत्तराखंड को स्कॉटलैंड की देन है।

दरअसल, 40 के दशक में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान रॉयल गढ़वाल राइफल यूरोप में मित्र राष्टों की तरफ से उतरी थी। इस दौरान गढ़वाल राइफल स्कॉटलैंड गई।

वहां गढ़वाली जवानों ने बैगपाइपर यानी मसकबीन सुना तो वे झूम उठे। कुछ जवान अपने साथ मसकबीन गढ़वाल ले आए। यहां पर ढोल दमऊ के साथ उसका नया फ्यूजन बना और आज वह पहाड़ के हर गांव में रच बस गया है।
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दून में गहरी नींद सोए हैं स्कॉटिश

चंदरनगर और मसूरी के ईसाई कब्रिस्तान में अधिकतर कब्रें अब भी स्कॉटिश मूल के लोगों की है। इनमें भी अधिकतर स्कॉटिश सिपाही थे। हालांकि  स्कॉटिश कब्रों के बाद आयरिश लोगों की भी कब्र दून और मसूरी में बहुत बड़ी तादाद में है।

समझते थे गुलामी का दर्द
विजय रावत बताते हैं कि स्कॉटिश लोग गुलामों पर कम ज्यादती किया करते थे। स्कॉटलैंड खुद ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था। लिहाजा स्कॉटिश गुलामी का दर्द समझते थे। यही वजह थी कि उत्तराखंड में रहने के दौरान उन्होंने पहाड़ के लोगों के साथ कभी बुरा बर्ताव नहीं किया।

रावत बताते हैं कि आज भले ही अंग्रेज स्काटलैंड वासियों को बराबरी का दर्जा देते हैं, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। ब्रिटिश सेना में स्कॉटलैंड और आयरिश मूल के लोगों को सिपाहियों के तौर पर ही नियुक्त किया जाता था। हालांकि 19वीं सदी में स्कॉटिश अपनी मेहनत और योग्यता के बलबूते अधिकारी भी बनने लगे।
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