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उत्तरकाशी के माकुड़ी में हादसे को याद कर नम हुई उपेंद्र की आंखें

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आपदा प्रभावित उपेंद्र -----अरविंद सिंह
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मेरी दुनिया है मां तेरे आंचल में, शीतल छाया तू दुख के जंगल में...। फिल्म तलाश के इस गीत की हर लाइनें यह संदेश देती हैं कि बच्चों के लिए उसकी मां की कितनी अहमियत है। यदि मासूमों की आंखों के सामने मां सैलाब में बह जाए और वह कुछ न कर पाए तो इससे बड़ा दुख उस बच्चे के लिए और क्या हो सकता है।
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ऐसा ही कुछ दर्दनाक हादसा भाकुड़ी गांव निवासी उपेंद्र व उसके दो मासूम बच्चों अंशिका (5) व विद्या (3) के साथ हुआ। आराकोट व उसके आसपास के इलाकों में बादल फटने से हुई तबाही के दौरान जब उपेंद्र व उसके दो मासूम बच्चों के सामने पत्नी तरोजना सैलाब में बह गई। वह तरोजना के साथ दोनों मासूम बेटियों को कंधे पर बैठाकर सुरक्षित स्थान की ओर से जा रहा था। तभी सैलाब आ गया गया और तरोजना बह गई। पिता के कंधों पर बदहवासी की हालत में बैठी मासूम बेटियां अंशिका व विद्या मां को बेबस सैलाब में बहते देखती रह गईं। मां को सैलाब में बहते देख बेटियां मम्मी... मम्मी... चिल्लाती रही और वह सैलाब में गुम हो गई।
हादसे के बाद दून अस्पताल में इलाज करा रहे उपेंद्र ने हादसे का हाल बयां किया तो उनका गला भर आया और आंखें नम हो गईं। पत्नी तरोजना को याद करते हुए उपेंद्र ने बताया कि बेटियों के कंधे पर सवार होने की वजह से कुछ भी नहीं कर पाया। अगर बेटियां को छोड़ता को वे दोनों भी सैलाब में बह जाती। हादसे के बाद जो दूसरा सैलाब आया तो उसमें वह भी बह गया था, लेकिन बेटियां सुरक्षित रही। सैलाब की चपेट में आने से वह घायल हो गया। मां को अपनी आंखों के सामने भयावह सैलाब में बहते देख दोनों बेटियां गुमसुम हैं।
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उपेंद्र ने बताया कि उसके माता-पिता की 15 साल पहले ही मौत हो चुकी है। कोई भाई बहन नहीं है। ऐसे में दोनों बेटियों को देखने वाला कोई नहीं है। बहरहाल दोनों बेटियों को उसकी मौसी अपने साथ ले गई है। उपेंद्र को इस बात का मलाल है कि उसकी आंखों के सामने ही पत्नी सैलाब में गुम हो गई और वह कुछ नहीं कर पाया।
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