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बाघों के लिए सबसे खतरनाक जगह उत्तराखंड

Thu, 09 Oct 2014 01:50 AM IST
ओमप्रकाश सती/ अमर उजाला, हल्द्वानी
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उत्तराखंड कुमाऊं मंडल बाघों के लिए कब्रगाह बन गया है। बाघों के शिकार और तस्करी में कुमाऊं के नैनीताल, चंपावत और पिथौरागढ़ देश के टॉप 73 जनपदों में शामिल हैं।
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ये आंकड़ा डब्ल्यूपीएसआई, स्नो लेपर्ड ट्रस्ट (यूएसए) और नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन की ओर से किए गए एक सर्वे में सामने आया है।

सर्वे देश के कुल 605 जनपदों में किया गया था, जिसमें से सर्वाधिक शिकार और तस्करी वाले सबसे ज्यादा संवेदनशील 73 जनपदों को चुना गया। इन जनपदों में अलर्ट भी जारी किया गया है।

वाइल्ड लाइफ प्रोटक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया (डब्ल्यूपीएसआई) के टीटो जोजेफ के अनुसार 1972-2012 तक हुई घटनाओं और इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।
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उत्तराखंड के ये तीन जिले सबसे संवेदनशील

रिपोर्ट के अनुसार नेपाल से सटे होने की वजह से कुमाऊं के ये तीन जनपद बेहद संवेदनशील हैं।

क्योंकि दिल्ली के अलावा आसपास का कुछ माल इन्हीं जनपदों के रास्ते कुमाऊं से नेपाल भेजा जाता है, जहां से वो चीन जाता है। रेल रूट पर होने के चलते नैनीताल को सबसे ज्यादा संवेदनशील बताया गया है।

आशंका जताई गई है कि दिल्ली से भी यहां माल लाकर नेपाल भेजा जाता है। रिपोर्ट में शिकार और तस्करी रोकने के लिए भी कुछ सुझाव दिए गए हैं।

डीआईजी ने भी वन्यजीव तस्करी रोकने पर दिया जोर
वन्यजीवों के शिकार और तस्करी को लेकर पुलिस भी गंभीर है। डीआईजी कुमाऊं जीएस मर्तोलिया ने भी सीमांत जनपदों में शिकार (विशेषकर कस्तूरी मृग) रोकने पर फोकस की बात कही। उन्होंने पिथौरागढ़ और चंपावत से इसके लिए विशेष अभियान चलाने को भी कहा है।

रामगंगा घाटी में एक तेंदुआ ढेर

डीडीहाट (पिथौरागढ़) की ऊपरी रामगंगा घाटी में सोमवार की रात एक और तेंदुए को मौत के घाट उतार दिया गया है।

इससे पहले शनिवार की रात भी एक तेंदुआ शिकारियों की गोली का निशाना बना था लेकिन उसकी मौत से शिकारी संतुष्ट नहीं थे और वास्तविक नरभक्षी की तलाश में घेराबंदी किए हुए थे।

सोमवार रात मारे गए तेंदुए के बाद शिकारियों की टीम पूरी तरह संतुष्ट है। दावे के साथ कहा गया है कि इलाके में आतंक फैलाने वाला यही तेंदुआ था। शिकारी लखपत सिंह रावत और उनकी टीम ने स्यालवे गांव के पास चार दिन से एक मचान लगाकर छोड़ रखा था।

शिकारियों को इस बात का पूरा यकीन था कि तेंदुआ शाम के समय शिकार के लिए निकलता है और रात में लौटकर वह स्यालवे गांव में ही आ जाता है। मचान के पास जिस कटरे को बांधा गया था तेंदुए ने उसे मारा तो था लेकिन उसके शरीर के कोमल हिस्से को ही वह खा पाया था।

तेंदुए का वजन 1.20 क्विंटल निकला

मारे गए तेंदुए की उम्र करीब 14 साल बताई गई है। वह आठ फिट पांच इंच लंबा है। 80 सेंटीमीटर ऊंचाई वाले तेंदुए का वजन 1 क्विंटल 20 किलोग्राम निकला। यह नर था।

पहाड़ पर अब तक इतना बड़ा तेंदुआ नहीं मिला था। इस तेंदुए के दांत नहीं थे। नाखून घिस चुके थे। इन सारे तथ्यों का अध्ययन करने के बाद घोषणा की गई कि नरभक्षी मारा जा चुका है।

शिकारी लखपत सिंह ने बताया कि मादा तेंदुआ कभी भी नरभक्षी बन जाती है लेकिन नर तेंदुआ आठ वर्ष की उम्र के बाद ही आदमियों पर हमला करता है।

एसडीएम ने टीम को दी शाबासी
उपजिलाधिकारी जयभारत सिंह ने नरभक्षी का आतंक समाप्त करने वाली शिकारियों की टीम को शाबासी दी। उन्होंने कहा कि आज मारे गए तेंदुए के साथ जिस तरह की परिस्थिति और तथ्य जुड़े हैं उससे स्पष्ट होता है कि यही असली नरभक्षी है।

वन रेंजर डीके राय ने बताया कि अभी इलाके में मवेशीखोर तेंदुए मौजूद हैं लेकिन उनसे कोई खतरा नहीं है। उन्होंने कहा कि लोग सावधानी बरतें और शाम के समय घर से बाहर न निकला करें। अभी कुछ समय तक वन विभाग की टीम पूरी स्थिति पर नजर रखेगी।
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पोस्टमार्टम के बाद तेंदुए का शव जलाया

इससे साबित हो गया कि नरभक्षी तेंदुआ यहीं कहीं आसपास रुका हुआ है। सोमवार की शाम छह बजे शिकारी लखपत के साथ हरि सिंह रावत, जॉय ह्युकिल और दयाल मचान पर मोर्चा संभालकर बैठ गए।

करीब सात बजे जैसे ही तेंदुआ दिखा तो लखपत सिंह ने उस पर 100 मीटर की दूरी से गोली दाग दी। गोली तेंदुए का सीना चीरते हुए निकल गई।

तेंदुआ कराहता हुआ पहले 100 मीटर आगे भागा फिर एक पहाड़ी से 150 मीटर नीचे गहरी खाई में जा गिरा। रात में ही तेंदुए को उठाकर स्यालवे गांव लाया गया। मंगलवार सुबह उसे पोस्टमार्टम के लिए डीडीहाट पहुंचाया गया।

तेंदुए को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ गई। पोस्टमार्टम के बाद तेंदुए के शव को जला दिया गया है। वन रेंजर डीके राय ने बताया कि नरभक्षी तेंदुए का अब अंत हो गया है। ऊपरी रामगंगा घाटी में 14 लोगों को शिकार बनाने वाले वास्तविक नरभक्षी की मौत हो गई है।
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