राज्य कैबिनेट में मंत्री की एक सीट रिक्त है तो दावेदार भी कई हैं। कोई किसी कारण से तो कोई किसी बड़े नेता का करीबी होने से। हालांकि कसरत तो बहुत दिनों से चल रही है लेकिन एक मंत्री के दिवंगत होने के बाद सबने जोर लगाया है।
एक माननीय का नाम मंत्री के लिए बार-बार चलता है लेकिन हर बार ‘काली बिल्ली’ रास्ता काट देती है। फिर खुद ही सफाई देते घूमते हैं कि मैं अकेला कतई नहीं बनूंगा, मैंने ऊपर कह दिया है कि पहले फलां को बनाओ, उसका हक है, तभी मैं भी मंत्री पद की शपथ लूंगा।
इन माननीय का भी दौर था जब चिराग धूं-धूं कर जलते थे। लेकिन अब दौर कुछ और है। पुरानी रणनीति कारगर भी नहीं रही। इसलिए इस बार खुद पर भी कंट्रोल कर रखा है।
जनाब को खतरा इस बात का है कि यदि इस बार भी ‘काली बिल्ली’ ने रास्ता काट दिया तो फिर शायद ही रास्ता बने। क्योंकि अगली बार जनता जनार्दन क्या फैसला ले, यह कहना भी आसान नहीं है।