फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

40 गांवों में नहीं बचा एक भी इंसान, जानिए वजह

Sat, 24 May 2014 08:55 PM IST
कुलदीप खंडेलवाल/अमर उजाला, लैंसडौन
विज्ञापन
विज्ञापन
रणिहाटलगा मंजीना गांव में 30 से अधिक परिवार निवास करते थे। गांव के लिए सड़क नहीं बनी। पानी का संकट भी दूर नहीं हो पाया। शिक्षा की भी कोई व्यवस्था नहीं हो पाई।
विज्ञापन


गांव छोड़कर पौखाल कस्बे में रहने वाले बृजमोहन गुसाईं का कहना है कि राज्य बनने पर उम्मीद थी कि उनके कष्ट दूर होंगे। ऐसा नहीं हुआ तो वे स्वयं ही सुविधाओं वाले स्थानों पर आकर बस गए। अब गांव में कोई नहीं रहता।

ये सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है, उत्तराखंड राज्य बनने के बाद आज कई गांव ऐसे हो गए हैं जहां पर आज घरों में एक भी इंसान नहीं बचा है।

राज्य न‌िर्माण के बाद तेज हुआ पलायन

अपना राज्य बनेगा तो विकास की रफ्तार तेज होगी। सुविधाएं आखिरी आदमी तक पहुंचेगी लेकिन लैंसडौन तहसील के लिए यह दिवास्वपन ही रहा। जब लोगों तक विकास नहीं पहुंचा तो लोग खुद ही विकास तक पहुंच गए।

स्थिति यह हो गई कि तहसील के 40 गांव में एक भी इंसान नहीं बचा है। 25 गांवों में आबादी एक से दस के बीच सिमट गई है।

पलायन की स्थिति यूं तो पूरे पहाड़ में काफी खतरनाक स्थिति में पहुंच चुकी है। राज्य गठन से पहले बहुत कम गांव ऐसे थे, जिनकी आबादी शून्य तक पहुंची थी, लेकिन राज्य निर्माण के बाद तो गांवों के खाली होने की बाढ़ सी आ गई। जिसकी तस्वीर अब इस रूप में सामने आ रही है।

चुनावी एजेंडे से पलायन का मुद्दा गायब

पलायन की वजह जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की दिक्कत रही तो वहीं कुछ लोग गांवों की कष्ट भरी जिंदगी की जगह शहर की ऐशोआराम की जिंदगी को तरजी दी।

लैंसडौन तहसील के जिन चालीस गांवों में कभी जिंदगी के गीत गूंजते थे, वहां अब वन्य जीवों का बसेरा हो गया है।

राज्य बनने से पहले तक तो पलायन चुनावी मुद्दा बनता रहा। तब कहा जाता था कि अलग राज्य बना तो पलायन थमेगा। ऐसा होना तो दूर रहा अब तो पलायन का मुद्दा राजनीतिक दलों के एजेंडे से भी दूर हो गया है।

पैतृक घर छोड़ किराये के कमरों में सिमटी

कई लोग तो गांव छोड़ शहरों में मकान बनाकर स्थायी रूप से रहने लगे हैं। वहीं कुछ लोग अपने गांव में या तो ताले लगाकर शहर आ गए लेकिन यहां अपने लिए घर नहीं बना पाए और आज भी किराए के घरों में रहने लगे हैं।

ये गांव हो गए आबादी विहीन
अलजुणी, चमकोट, समरगांव, क्वाराली, अगरोड़ा, उजियाणा, मटियालना सैर, तलाईसेरा, मटियाली गूंठ, पुलिंडा, कुमैथ, थान, स्यालनी लगा कांडई, थाड़ा, करौती, रणेठा, तमेरगांव, अल्मोड़ी, इडियागढ़, भंडारसेरा, गिजार, ढिसवाणी, महरकोट, रणिहाटलगा मंजीना, रणिहाट, चौंकसेरा, भैकलिया, मथगांव, झबरा, बैंडगांव, रिंगवाड़गांव, धेड़िया, पुछड़ीलगा गुणेथा, थान लगा कुलांसू, डंगलखेत, गला, बवांसा, राजसैरा, सतनसेर, मेल गांव तल्ला, शामिल हैं।
विज्ञापन

क्या कहते हैं सामाजिक कार्यकर्ता

गांव में सड़कें तो पहुंच रही हैं, लेकिन अब देर हो चुकी है। जहां सड़क है भी वहां शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की उचित व्यवस्था नहीं है।

अभावों में जी रहे लोगों के लिए गांव छोड़ने के अलावा और विकल्प भी नहीं है। मानसून पर आधारित खेती भी वन्यजीव डकार रहे हैं, ऐसे में लोग खेती से विमुख होकर शहरों की तरफ रुख कर गए।
-निर्देश कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें