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अपनी दादी की वजह से महंत अवेद्यनाथ बने वैरागी

Sun, 14 Sep 2014 04:23 PM IST
महेंद्र बिष्ट / अमर उजाला, यमकेश्वर (पौड़ी)
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गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने की खबर मिलते ही उत्तराखंड में भी शोक की लहर छा गई है। महंत अवेद्यनाथ मूलरुप से पौड़ी जिले के यमकेश्वर ब्लाक के कांडी गांव के थे।
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पौड़ी जिले के यमकेश्वर ब्लाक के कांडी गांव के मूल निवासी महंत अवेद्यनाथ के बचपन का नाम कृपाल सिंह बिष्ट था। उनके पिता राय सिंह बिष्ट और मां की उनके बाल्यकाल के दौरान ही मौत हो गई थी, जिसके कारण लालनपोषण का जिम्मा बूढ़ी दादी के कंधों पर आ गया।

प्रारंभिक एवं माध्यमिक तक की शिक्षा यमकेश्वर के चमकोटखाल से हुई। दादी की मौत के बाद उनके मन में वैराग्य की भावना जागृत हुई और वह गृह त्यागकर ऋषिकेश चले गए। वहां संयासियों के साथ रहने लगे। संयासियों के सत्संग से उनकी भारतीय धर्म दर्शन के अध्ययन में रुचि जागी।
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आत्मा की अमरता के ज्ञान की खोज में थे बेचैन

किशोरावस्था में ही उन्होंने कैलास मानसरोवर की यात्रा कर ली थी। इस यात्रा से उनका मन बहुत विचलित हो चुका था। वे संसार की नश्वरता के साथ आत्मा की अमरता के ज्ञान की खोज में बेचैन थे। उसी समय उनकी भेंट योगी निवृतिनाथ जी से हुई।

योगी निवृतिनाथ के योग आध्यात्मिक दर्शन और नाथपंथ के विचारों का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा। इससे वे नाथपंथ के सामाजिक समंवयवादी दृष्टिकोण एवं हठयोग साधना की ओर खिंचते चले गए। वर्ष 1940 में गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ से कृपाल सिंह बिष्ट की पहली भेंट हुई।

महंतजी ने उन्हें अपना शिष्य एवं उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन कृपाल ने उस समय यह कहकर मना कर दिया कि वह नाथपंथ को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। इसके बाद वह पुन: ऋषिकेश आ गए और योगी शांतिनाथ के सानिध्य में प्राच्यदर्शन का अध्ययन करने लगे।

सन 1942 को योगी शांतिनाथ ने कृपाल को पुन: गोरखपुर भेज दिया। 23 वर्ष की अवस्था में 08 फरवरी 1942 को गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ ने अवेद्यनाथ को विधिवत दीक्षा देकर अपना शिष्य एवं उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। महंत अवेद्यनाथ उत्तर प्रदेश विधानसभा के पांच बार मानीराम विधानसभा सीट से विधायक रहे।
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जन्मभूमि के लिए भी किए काम

1962 में पहली बार विधायक बने अवैद्यनाथ 1967, 1969, 1974 और 1977 में लगातार विधानसभा में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। 1969, 1989, 1992 और 1996 में चार बार गोरखपुर से सांसद रहे। 1969 में महंत दिग्विजयनाथ के ब्रह्मलीन होने पर उन्होंने गोरक्षपीठ मंदिर के महंत की गद्दी संभाली।

ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ ने अपनी जन्मभूमि के लिए ग्राम कांडी के लिए एक पेयजल योजना, देवी मंदिर की स्थापना व धर्मशाला की स्थापना के लिए धन दिया था। कोटद्वार स्थित देवीमंदिर के जीर्णोद्धार के लिए भी धन उपलब्ध कराया। विथ्याणी में महायोगी गुरु गोरखनाथ महाविद्यालय की स्थापना करवाई।

जिसमें क्षेत्र के सैकड़ों छात्र/छात्राएं उच्चशिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। महंतजी के देहावसान पर क्षेत्र में शोक की लहर है। महाविद्यालय और उनके पैतृक गांव कांडी में शोकसभा का आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

यमकेश्वर की ब्लाक प्रमुख कृष्णा नेगी ने इसे क्षेत्र और पूरे देश के लिए अपूरणीय क्षति बताया। शोकसभा में मंडी समिति के उपाध्यक्ष अशोक नेगी, ग्राम कांडी के राधा देवी, कोमल सिंह, धीर सिंह, विनोद नेगी आदि लोग मौजूद थे।
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