भारत के स्वाधीन होने के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री बने प्रताप सिंह कैरों ने स्वर्ण सिंह के परिवार को नैनीताल जिले में बसाया था। स्वर्ण सिंह बताते हैं कि 1945 में वह अपने परिवार के साथ जालंधर पहुंचे। एक साल बिताने के बाद पटियाला आ गए। 1952 में खुड्डा पोस्ट सनौर पटियाला पंजाब की हरभजन कौर से शादी रचाई। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं।
सिख बेटियों को बचाकर लाए थे रिफ्यूजी कैंप
अंग्रेजों की फूट डालो नीति पर जब विभाजन हुआ तो पाकिस्तानियों ने सिख बेटियों को बंधक बना लिया। जिन्हें वह अपने तीन अन्य साथियों के साथ बचाकर रिफ्यूजी कैंप लेकर आए। विभाजन का मंजर आज उनकी आत्मा को झकझोर देता है।
चार भाषाओं के जानकार हैं स्वर्ण
स्वर्ण सिंह ने पाकिस्तान में उर्दू से चार जमात तक शिक्षा ली थी। जब वह पटियाला आए तो उन्होंने गुरमुखी (पंजाबी) सीखी और वह हिंदी, उर्दू, पंजाबी के अलावा फारसी भाषा का भी ज्ञान रखते हैं।
कवि भी है स्वर्ण सिंह
कीर्ति कुरबानी तू देश आजाद बदले, नया समा पतंगा तूं भगत सिंह..बस मार रेला उड़ा दितियां, असंबेली बंब चलाए तूं भगत सिंह..तू बदल तकदीर तस्वीर देती, ऐसे चंद चड़ाए तूं भगत सिंह..शमेर पर्वत दी सिने पार सुटे, ऐसे एटम चलाए तू भगत सिंह....।
देश पर कुर्बान शहीद सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सिंह की फांसी को याद करते हुए स्वर्ण ने अपनी कलम से कविताएं लिख डालीं। उन्होंने जपु जी साहिब सटीक समेत कई धार्मिक किताबें भी लिखीं। धर्म के प्रति गहरी आस्था होने से ही उन्हें उत्तर भारत के ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब का रिसीवर भी चुना गया था।