नंदा राजजात यात्रा में 14 साल बाद आखिरकार वह क्षण आया, जब नंदा अपने भाई लाटू से मिल पाई। सुबह ठीक 9.35 बजे निर्जन पड़ाव की यात्रा के लिए निकली नंदा वाण गांव से करीब एक किमी ऊपर लाटू देवता के मंदिर में पहुंची, तो मंदिर का नजारा ही बदल गया।
कुरूड़ की नंदा के साथ-साथ लाता की डोली और सप्तकुंड की डोली सहित अन्य डोलियां और छंतोलियां मंदिर में पहुंची। पूजा-अर्चना के बीच लाटू मंदिर से बाहर निकले, तो पहले कटार भेंट कर उन्होंने नंदा की परीक्षा ली। नंदा इस परीक्षा में पास हुई तो उसके बाद वर्षों बाद मिले भाई-बहन का मिलन हो पाया।
लाटू सीधे-साधे देवता है और ज्यादा बोल नहीं पाते हैं। हावभाव में लाटू ने बहन नंदा के आगे की यात्रा के लिए पथ-प्रदर्शक होने का निमंत्रण स्वीकार किया।
ठीक 10.35 मिनट पर लाटू की अगुवाई में नंदा अब कैलास यात्रा के लिए रवाना हो गई। आगे के निर्जन पड़ाव है और लाटू की अगुवाई में ही अन्य डोलियां और देव छंतोलियां आगे बढ़ रही है। यात्रा देर शाम रणकधार होते हुए गैरोली पातल पहुंची है। यहां देवी खुले आसमान के नीचे विश्राम करेगी।