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नरेंद्र मोदी के गढ़ में राहुल सेना 'सुस्त'

Mon, 31 Mar 2014 11:30 AM IST
विजय त्रिपाठी/ अमर उजाला, गांधीनगर
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ना...ना करते गांधीनगर संसदीय सीट से आखिरकार हां करने वाले भाजपा के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी से कांग्रेस कैसे लोहा ले रही है, एक बानगी से इसकी शुरुआत..
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दिन के 11:30 बजे हैं। गांधीनगर के कांग्रेस दफ्तर में सन्नाटा पसरा है। आवाज देने पर एक बुजुर्गवार बाहर का गेट खोलने आते हैं।

परिचय देने पर छूटते ही बोल पड़ते हैं- अझ संडे की चुट्टी (छुट्टी) है, तमे पता नई छे। ये सज्जन जिलू बा चावड़ा कांग्रेस कार्यकर्ता हैं।

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बात शुरू हुई तो बताते हैं कि संडे को कोई नहीं आता। पांच को पर्चा दाखिली है, आज शाम को शायद मीटिंग हो। 10 मिनट के फासले पर भाजपा जिला कार्यालय पहुंचने पर आडवाणी की जीत के प्रति संकल्पित चार-पांच कार्यकर्ता कागज-पत्तर दुरुस्त करते मिले।

यहां चलेगा विकास का कार्ड

आज कहां- कैसे पहुंचना है, रणनीति बनाई जा रही है। बातचीत शुरू होने पर एक कार्यकर्ता कमलेश भाई कहते हैं- मोदी साहब ने यहां एक से एक ऐसे नेशनल-इंटरनेशनल लेवल के इंस्टीट्यूट बनवाए हैं कि यहां के चुनाव में और कोई मुद्दा ही नहीं है।

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विकास का कार्ड चलेगा। यहां लोग वोट किसे देंगे-मोदी को या आडवाणी को, इस सवाल पर वे राजनीतिक जवाब देते हैं- भाजपा को। भाजपाई भले आश्वस्त हों लेकिन आडवाणी परिवार शायद कम्फर्ट जोन में नहीं है।

यहां मतदान भले ही एक महीने बाद 30 अप्रैल को हो लेकिन बेटी प्रतिभा आडवाणी का अभी से एक पैर दिल्ली तो एक पैर गांधीनगर में रहता है। जीत के लिए वे अभी से कील-कांटे दुरुस्त करने में जुट गई हैं।

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शायद पिछले लोकसभा चुनाव से आडवाणी परिवार ने सबक लिया है जब कांग्रेस के सुरेश पटेल आखिरी समय में बाजी पलटते दिखे थे और मतदान के दो दिन पहले पूरे परिवार को दिल्ली से यहां डेरा डालना पड़ गया था।

गुजरात में मोदी लहर नहीं मोदी सुनामी है

भाजपा देश भर में उमड़ी मोदी लहर को यहां मोदी सुनामी मानती है।

इस हवा में भाजपा का कोई भी प्रत्याशी रत्ती भर भी हैसियत नहीं रखता, लिहाजा आडवाणी खेमे ने बड़ी चालाकी से अपने प्रचार अभियान की कमान मोदी की अति विश्वस्त और मोदी सरकार में लगभग नंबर दो की हैसियत वाली आनंदीबाई पटेल को सौंप दी है।

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भाजपा की लड़ाई को नए परिसीमन ने और आसान कर दिया है कि अहमदाबाद की जिस विधानसभा सीट से आनंदीबाई जीतकर आती हैं, वे सभी पटेल बहुल इलाके इस बार गांधीनगर संसदीय सीट से आ जुड़े हैं।

इस नई सूरत में आडवाणी खेमा आश्वस्त है कि अब आडवाणी को जिताए बगैर मोदी के पास और कोई रास्ता नहीं है।

इन समीकरणों का उल्लेख यहां इसलिए जरूरी है कि मोदी से पैदा हुई रार और खार के बाद आडवाणी अपना आखिरी चुनाव यहां के बजाय भोपाल (अति सुरक्षित) से लड़ना चाहते थे।

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बाद में मनो-मनुहार के बाद गलत संदेश जाने से रोकने के लिए आडवाणी यहां से लड़ने को राजी हुए। अब गेंद मोदी के पाले में है। इस सीट पर पटेल जाति के वोटरों की बहुतायत के मद्देनजर कांग्रेस ने अपने पूर्व मंत्री किरीट भाई पटेल को उतारा है।

इस बिरादरी पर मोदी का रसूख

उनकी पटेल बिरादरी पर अच्छी पकड़ बताई जाती है लेकिन मोदी का इस बिरादरी पर रसूख कम नहीं है। इसमें ज्यादा शक नहीं कि कम से कम अहमदाबाद, गांधीनगर जैसे निपट शहरी इलाकों में विकास और अमन-चैन के आगे जाति की बात बेदम हो गई है।

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कांग्रेस दफ्तर का गेट खोलने वाले जिलू बा चावड़ा अपनी बात इससे बंद करते हैं कि पहले हर त्योहार कर्फ्यू या नाकेबंदी के बीच होता था, 2002 के बाद से अब कम से कम अमन-चैन तो है।

ध्यान होगा कि 2002 में सांप्रदायिक हिंसा अहमदाबाद में ही हुई थी और उसके बाद से यहां किसी भी तरह का छोटा-बड़ा सांप्रदायिक संघर्ष नहीं हुआ।
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यहां पोस्टरों में आडवाणी

गांधीनगर में एक और अलग तस्वीर दिखती है। देश भर में लगने वाले पोस्टर, बैनर, होर्डिंग से जहां आडवाणी गायब हैं, यहां वे मोदी के साथ प्रचार सामग्री साझा करते दिख रहे हैं।

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अहमदाबाद और गांधीनगर के प्रमुख चौराहों पर लगे होर्डिंग में बड़े-से आडवाणी के साथ कुछ कम छोटे मोदी और कांशीराम राणा नजर आते हैं। आडवाणी काल बस इन्हीं तक रह गया है।
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