एक कार पर कई लोन लेने का मामला सामने आने के बाद संभागीय परिवहन विभाग ने वाहनों के पंजीकरण पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है।
अब वाहन के पंजीकरण से पहले संबंधित बैंक के लोन सेक्शन से पूछताछ की जा रही है, जहां से वाहन को फाइनेंस कराया गया है। इसी तरह बैंकों ने भी लोन सेक्शन को बिना जांच पड़ताल करे लोन जारी नहीं करने के सख्त निर्देश दिए हैं।
कुछ साल पूर्व दून के एक शोरूम संचालक ने बैंक कर्मचारियों के साथ मिलकर एक ही कार पर पांच लोन प्राप्त कर लिए। उसने साजिश के तहत पहले फर्जी ग्राहक बनाकर कार का लोन हासिल कर उसे बेचा। फिर उसी कार पर चार अन्य लोन लिए। हर बार कार को अलग अलग ग्राहक को बेचना दिखाया गया। अब मामले की जांच सीबीआई कर रही है। इसी शोरूम संचालक ने मेरठ में भी करोड़ों रुपयों का चूना बैंक को लगाया।
ऐसा ही कई मामले हर साल मार्च माह में शहर के विभिन्न थानों में दर्ज होते है। असल में, बैंक कर्मचारी और शोरूम की मिलीभगत से कार लोन ले लिया जाता है। बाद में जांच करने पर पता चलता है कि लोन लेने के बाद कार खरीदी ही नहीं गई। लोन लेकर ऐश किया गया।
पिछले दिनों दो घटनाओं से न केवल बैंक अधिकारियों की चिंता बढ़ गई, बल्कि संभागीय परिवहन कार्यालय ने भी वाहन पंजीकरण की कार्यप्रणाली पर पैनी निगाह रखना शुरू कर दिया है। दरअसल, शिकायत मिली है कि शहर के बाहर के कई वाहन शोरूम संचालक एक ही वाहन को फर्जी तरीके से कई लोगों को बेचकर उस पर लोन ले रहे हैं।
इस तरह का फर्जीवाड़ा सबसे ज्यादा ट्रैक्टर पर किया जा रहा है। बैंक कर्मचारी और शोरूम संचालक की मिलीभगत से कई ऐसे मामले पिछले कई सालों में सामने आ चुके हैं। सीबीआई की विशेष टीम ऐसे ही कुछ मामलों की जांच करने बुधवार को देहरादून व मेरठ के संभागीय परिवहन कार्यालय आई थी।
उसके एक दिन बाद ही कोलकाता से एक और सीबीआई की टीम देहरादून आरटीओ कार्यालय पहुंची। असल में कोलकाता की लाजिस्टिक कंपनी ने अपनी 16 वाल्वो बसों का फर्जी दस्तावेजों के आधार पर आरटीओ देहरादून में साल 2012 में पंजीकरण कराया, ताकि वाल्वो उत्तराखंड परिवहन निगम को ट्रांसफर कर दी जाए।
सभी 16 बसें परिवहन निगम में संचालित की जा रही हैं। गत शनिवार को संभागीय परिवहन अधिकारी दिनेश चंद्र पठोई ने कार्यालय में पंजीकरण अनुभाग को निर्देश दिए कि वह वाहनों का पंजीकरण करते समय बैंकों से आए दस्तावेजों की गहन जांच कर लें, जो भी दस्तावेज संदिग्ध लगे, तुरंत उस पंजीकरण को रोक लें और बैंक से संपर्क करें।
अगर किसी भी बैंक के लोन अनुभाग के फील्ड कर्मचारी सही तरीके से लोन के लिए आवेदन करने वाले की जांच करें तो फर्जीवाड़ा नहीं होता। ऐसे फर्जीवाड़ों से बैंक को बहुत नुकसान होता है। पकड़े जाने पर मुकदमा दर्ज कराया जाता है।
- डीके वर्मा, सहायक महाप्रबंधक, एसबीआई मुख्य शाखा