उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की सीमा से लगा नाली गांव अल्मोड़ा विधानसभा क्षेत्र का अंतिम मतदान केंद्र है। नाली गांव के मतदान केंद्र तक जाने के लिए साधारण बटिया (रास्ता) तक नहीं है।
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इस गांव के लिए सेराघाट से 1976 में पक्की गूल बनी। गूल का सवा फीट चौड़ा पल्ला ही गांव के लोगों का रास्ता है। ग्रामीण 10 किमी का रास्ता इसी गूल के पल्ले से तय करते हैं।
कुछ स्थानों पर यह रास्ता इतना खतरनाक है कि जरा सा संतुलन बिगड़ने पर राहगीर सीधे सरयू नदी में गिर जाएगा।
बरसात में यह रास्ता और जानलेवा हो जाता है। पिछले तीन साल में दो लोग इस रास्ते से निकलने के दौरान गिरकर जान गवा चुके हैं जबकि पिछले पांच साल में करीब 15 ग्रामीण गिरकर घायल हो चुके हैं।
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हेलीकॉप्टर से आकर वोट मांगने आते हैं नेता
नेताओं ने गांव के लिए सड़क तो नहीं बनाई लेकिन खुद चुनाव के वक्त हेलीकॉप्टर से आकर वोट मांग ले जाते हैं। पूरा इलाका काफी उपजाऊ है। यही कारण है कि तमाम असुविधाओं के बावजूद गांव से लोगों का पलायन नहीं हुआ है।
साल में करीब 15 हजार क्विंटल आम की पैदावार होती है लेकिन सड़क के अभाव में मंडी में पहुंचकर 20 रुपए किलो बिकने वाला आम गांव में दो रुपए किलो में बेचना पड़ता है।
जरूरी सामान मिले न मिले लेकिन इन गांवों में अवैध शराब धड़ल्ले से बिक रही है। गांव में चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी हैं पर लोगों को इस चुनाव के बारे में खास पता नहीं है।
गांव के लिए 10 किमी की पैदल यात्रा
अल्मोड़ा से नाली गांव जाने के लिए सेराघाट तक 65 किमी की दूरी बस से तय करनी पड़ती है। यहां से गांव के लिए 10 किमी की पैदल यात्रा शुरू होती है।
विडंबना है कि नाली गांव तक मोटर रोड तो दूर पैदल चलने के लिए बटिया तक नहीं है। नाली गांव से भल्यूटा इंटर कालेज तक करीब दो किमी का रास्ता स्कूली बच्चे इसी गूल से तय करते हैं। कई बार रोगियों को इस रास्ते डोली में बैठाकर ग्रामीण सेराघाट तक लाते हैं।
नाली गांव तक जाने वाला पूरा रास्ता घाटी से होकर गुजरता है। सरयू के पार की तरफ पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट ब्लाक के नैनोली, पिल्खी, तिमाड़ी, काल्वे आदि गांव स्थित हैं। नाली गांव पहुंचने से पहले सरयू नदी पर बने झूला पुल को पार करने के बाद कुछ दूरी पर सबसे पहले राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल आता है।
यहां आज तक प्राइमरी स्कूल नहीं
सुबह 10.30 बजे अस्पताल बंद मिला। वहां मौजूद ग्रामीणों ने बताया कि अगले दिन छुट्टी होने के कारण डाक्टर, फार्मेसिस्ट, वार्ड ब्वाय और चतुर्थ श्रेणी कर्मी सभी एक दिन पहले ही घर चले गए। कुछ रोगी सुबह अस्पताल पहुंचे थे वह भी लौट गए।
तल्ली नाली में करीब 150 परिवार रहते हैं लेकिन यहां आज तक प्राइमरी स्कूल नहीं है। यहां से एक किमी दूर मल्ली नाली के प्राथमिक स्कूल पहुंचे तो वहां तैनात तीन शिक्षक-शिक्षिकाओं में से एक भी मौजूद नहीं था।
आंगनबाड़ी सहायिका कमला टम्टा ने स्कूल खोलकर बच्चों को एक साथ बैठाया था। लोगों ने बताया कि हेड टीचर दो हफ्ते से एक दिन भी स्कूल नहीं आई है। तल्ली नाली के इसी स्कूल में लोग सात मई को मतदान करेंगे।
स्कूल के कमरों में कूड़ा बिखरा था। प्रधानाध्यापिका का कमरा अस्त-व्यस्त हालत में था। बच्चों के बैठने के लिए पूरी चटाई तक नहीं थी। मल्ली नाली के इस स्कूल में 56 बच्चे पढ़ते हैं।
इस स्कूल में तल्ली नाली के 500 मतदाता वोट डालेंगे। जबकि मल्ली नाली के ही दूसरे स्कूल में मल्ली नाली और कुंजकिमौला गांवों के कुल 800 मतदाता वोट डाल सकेंगे। फिलहाल इन स्कूलों में मतदान केंद्र बनाने की कोई तैयारी शुरू नहीं हुई है।
तल्ली और मल्ली नाली गांवों में जरूरी सामान मिले या न मिले लेकिन शराब बराबर उपलब्ध हो जाती है। इसके लिए शराब के धंधेबाजों का पूरा नेटवर्क काम करता है। अवैध शराब में ठिकानों तक खच्चरों से ढोई जाती है।
कुछ स्थानों पर ढाबेनुमा खोम्चे बने हैं जो सिर्फ शाम को खुलते हैं। सारतोला निवासी भगवान सिंह भैसोड़ा ने बताया कि गांव-गांव अवैध शराब बिकने के कारण कई बार स्कूली बच्चे भी शराब पी लेते हैं।
महिला मंगल दल की पूर्व अध्यक्षा पार्वती देवी ने बताया कि शराब के खिलाफ पहले आंदोलन हुआ था अब जल्दी दोबारा आंदोलन चलाया जाएगा।
एक करोड़ खर्च हुए पर पानी आया सिर्फ एक दिन मल्ली नाली में सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था नहीं है। 2007 में लघु डाल विभाग के अंतर्गत गांव के लिए करीब एक करोड़ रुपए की लागत से सरयू नदी से हाईड्रम योजना बनाई गई लेकिन इस योजना में सिर्फ एक दिन कुछ देर के लिए पानी आया।
तब से आज तक न तो पानी पहुंचा और न ही इस योजना को कोई देखने आया। सरकार के एक करोड़ रुपए पानी में डूब गए। ग्रामीण बताते हैं कि विभागीय अधिकारी और ठेकेदारों के खिलाफ कोई कार्रवाई तो दूर इस योजना की जांच तक नहीं हुई।