उत्तराखंड भाजपा में नेता प्रतिपक्ष को लेकर समीकरण बदलते दिख रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व इस बात पर मंथन कर रहा है कि विधानसभा के एक सत्र के लिए बदलाव करने के बजाय यह जिम्मेदारी अजय भट्ट के पास ही रहने दी जाए। ऐसा करने के लिए हाईकमान के पास दो तर्क हैं। एक तो नेता प्रतिपक्ष को लेकर विधानमंडल दल में चल रही गुटीय राजनीति पर लगाम लगेगी और दूसरे बजट सत्र में भट्ट के चार साल के तजुर्बे का फायदा मिलेगा।
दो माह बीतने को हैं लेकिन भाजपा ने अभी तक नेता प्रतिपक्ष का चयन नहीं किया। उसके पीछे वजह यह है कि विधानमंडल दल कई गुटों में बंट गया है। पहले इस पद के एकमात्र उम्मीदवार मदन कौशिक को अब पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत, पूर्व मंत्री व विधायक बिशन सिंह चुफाल और सबसे वरिष्ठ विधायक हरबंस कपूर से कड़ी टक्कर मिल रही है। स्थिति यह है कि विधायकों का एक गुट किसी एक दावेदार का विरोध करता है तो दूसरा गुट किसी और के विरोध में खड़ा है।
पिछले एक पखवाड़े में पार्टी के केंद्रीय हाईकमान में इस बात को लेकर तेजी से मंथन हुआ है कि मात्र एक बजट सत्र को लेकर नेता प्रतिपक्ष बदलने की जरूरत भी क्या है। सत्र से पहले यदि नेता प्रतिपक्ष को लेकर विधायकों की गुटबाजी सामने आई तो विपक्ष की रणनीति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
इसलिए पार्टी बदलाव की फजीहत से बचने का रास्ता भी तलाश रही है। अब देखना है कि पार्टी में चल रहे इस मंथन से क्या निष्कर्ष निकलता है। हालांकि, प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने कहा कि अभी केंद्र से किसी तरह के संकेत नहीं है, हाईकमान का जो आदेश होगा, सभी के लिए मान्य होगा।