हरिद्वार में 130 करोड़ रुपए की बेशकीमती भूमि सत्ता से जुड़े लोगों की नजर में चढ़ी है। मालिकाना हक विवादित है, लेकिन सरकारी कर्मियों की मदद से इस जमीन पर कब्जा हो गया।
पढ़ें, रात को 'लड़की' को बुलाया, जब नींद खुली तो उड़े होश
अब सत्ता से जुड़े लोग चाहते हैं कि जमीन या तो वादी को दे दी जाए या इसका अधिग्रहण किया जाए। वादी को देने की सूरत में इसका लैंडयूज बदला जाएगा। ऐसा हुआ तो भी सिफारिश कर रहे प्रभावशाली लोगों के पौ-बारह होंगे। अधिग्रहण की सूरत में भी कब्जेधारी को सर्किल रेट के हिसाब से भुगतान किया जाएगा।
जमीन को हथियाने की कोशिश
प्रभावशाली लोग इसमें भी फायदा देख रहे हैं। पूर्व की भाजपा सरकार के दौरान भी इस जमीन को हथियाने की कोशिश सत्ता से जुड़े लोगों ने की थी, लेकिन मामले में पेंच होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।
गौरतलब है कि हरिद्वार में खसरा संख्या 4/27 पर भूपतवाला में 29060 वर्ग मीटर और खसरा संख्या 48/28 पर 3137 वर्ग मीटर सरकारी भूमि है। सितंबर 2009 में हरिद्वार निवासी तोष कुमार जैन ने एक महंत से पावर ऑफ अटार्नी लेकर अपनी पत्नी मोनिका जैन के नाम इनकी रजिस्ट्री की।
पढ़ें, इस 'चिराग' ने रौशन किया उत्तराखंड का नाम
2010 में नक्शा पास कराने की कोशिश हुई तो एचडीए ने इंकार कर दिया। इसके खिलाफ जैन हाईकोर्ट चले गए तो न्यायालय ने नक्शा पास करने या फिर लैंड यूज चेंज करने को कहा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने एचडीए की अर्जी पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट का फैसला निरस्त कर मंडलायुक्त को अपील सुनने के आदेश दिए।
जमीन वादी को देने या अधिग्रहण करने का आदेश
इसी बीच जुलाई 2013 को कमिश्नर ने जमीन वादी को देने या अधिग्रहण करने का आदेश दिया। कहानी आगे बढ़ी और 30 जुलाई 2013 को एचडीए ने डीएम व मेलाधिकारी से पूछा कि पिछले मेलों के आयोजनों में जमीन का क्या उपयोग रहा और भविष्य में क्या जरूरत है।
पढ़ें, अपना दबदबा दिखाने की कोशिश में बहुगुणा कैंप
भूमि का मालिक कौन है। डीएम ने जरूरत बताकर भूमि अधिग्रहण करने को कहा। इसी बीच एचडीए ने शासन को रिपोर्ट भेजकर 130 करोड़ रुपए मांगे। इससे भी आगे जाकर आवास विभाग ने बगैर वित्त विभाग की मंजूरी के एचडीए को स्वयं के माध्यमों से जमीन अधिग्रहण करने को कहा।
फिर भी, इस मामले तीन बार हुई बोर्ड बैठक में कोई नतीजा नहीं निकला। इसी बीच नए कमिश्नर डीएस गर्ब्याल ने 12 नवंबर 2013 को एचडीए के तत्कालीन वीसी रंजीत सिन्हा को जमीन के मालिकाना हक की जांच के आदेश दिए।
ये है जांच का परिणाम
वीसी एचडीए रंजीत सिन्हा ने मंडलायुक्त को सौंपी रिपोर्ट में लिखा कि फसली वर्ष 1359 (1951) में यह जमीन नॉन जेडए की श्रेणी 10 (1) में दर्ज थी। इस वर्ग की जमीन पर किसी को मालिकाना हक नहीं मिल सकता।
वहीं इसकी श्रेणी भी परिवर्तित नहीं हो सकती। लेकिन कुटरचित तरीके से खसरा संख्या 4/27 को 3.350 हेक्टेयर जमीन को 1983 में श्रेणी 9 में परिवर्तित कर दिया गया। लेकिन 4/28, 29 खसरा संख्या श्रेणी 10 में ही है। इस जमीन पर डेरा बाबा दरगाह सिंह प्रबंधक महंत साधु सिंह का कब्जा था।
पढ़ें, मंत्री के भाई हैं तो क्या कुछ भी करेंगे?
जांच में पाया गया कि इस जमीन का 1951 से 1981 केबीच का रिकॉर्ड गायब है। पुराने दस्तावेजों से पता चला है कि खसरा संख्या 4/28 व 48 नंबर भूमि पीडब्लूडी की है और 4/27 मेला भूमि है।
...तो क्यों रद हुआ दाखिल खारिज का आदेश
यदि इस जमीन पर कोई विवाद न होता तो एसडीएम सदर हरिद्वार वादी के पक्ष में किए गए अपने ही दाखिल खारिज के फैसले को निरस्त नहीं करते।
जमीन सरकार की है इसीलिए तहसीलदार ने इस जमीन पर दावेदार के पक्ष में दाखिल खारिज करने से इंकार कर दिया था। बाद में एसडीएम ने यह कार्रवाई की लेकिन बाद में वापस लेनी पड़ी।
वीसी एचडीए की जांच रिपोर्ट में काफी तथ्य मिले हैं। चूंकि रेवेन्यू रिकॉर्ड का कस्टोडियन डीएम होता है इसलिए अब डीएम हरिद्वार से जांच रिपोर्ट पर आख्या मांगी गई है। इसके बाद आगे की कार्रवाई होगी।
- डीएस गर्ब्याल, कमिश्नर गढ़वाल