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55 साल बाद काम के आकलन पर तय होगी दिहाड़ी, प्रस्ताव बनाकर भेजा

Tue, 08 May 2018 08:00 PM IST
अंकित कुमार गर्ग, अमर उजाला, रुड़की
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देश में 55 साल बाद काम के आकलन के आधार पर मजदूरों की दिहाड़ी निर्धारित करने की कवायद शुरू हो गई है।

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इसमें महत्वपूर्ण यह है कि विभिन्न राज्यों में काम की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए दिहाड़ी की असमानता को खत्म किया जाएगा। ग्राम्य विकास विभाग के अपर सचिव राम विलास यादव की ओर से आईआईटी सहित अन्य तकनीक संस्थानों को टाइम एंड मोशन स्टडी (समय एवं गति अध्ययन) के लिए शोध एवं उसमें लगनी वाली लागत के बाबत प्रस्ताव मांगा है। आईआईटी रुड़की ने विभाग को शोध के लिए 66 लाख रुपये का प्रस्ताव बनाकर भेज दिया है। जबकि इससे पहले देेश में मजदूरों की दिहाड़ी तय करने के लिए वर्ष 1962 में टाइम एंड मोशन स्टडी कराई गई थी।   
 
विभिन्न राज्यों में मजदूरों की दिहाड़ी तय करने के लिए टाइम एंड मोशन स्टडी अलग-अलग आयु वर्ग के मजदूरों को ध्यान में रखकर की जाएगी। इसके लिए पांच श्रेणियां बनाई गई हैं। जिसमें 18 से 40 वर्ष, 40 से 50 वर्ष, 50 से 60 वर्ष और 60 वर्ष से अधिक आयु के अलावा शारीरिक रूप से पूरी तरह सक्षम नहीं होने वाले मजदूर शामिल होंगे। उत्तराखंड में शोध के लिए 13 जनपदों को काम की कठिनाई के हिसाब से तीन श्रेणियों में बांटा गया है। प्रत्येक श्रेणी में तीन-तीन विकास खंडों का चयन कर नौ-नौ ग्राम पंचायतों में विभिन्न आयु वर्ग के महिला, पुरुष एवं दिव्यांग व्यक्तियों की टीम के आठ घंटे काम का आकलन किया जाएगा। इन आठ घंटों में एक घंटे का विश्राम भी दिया जाएगा। केंद्रीय स्तर पर इस प्रोजेक्ट के लिए मनरेगा निदेशक नई दिल्ली की अध्यक्षता में 11 लोगों की हाई पावर कमेटी बनाई गई है।
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उत्तराखंड से ग्राम्य विकास विभाग के राजेंद्र सिंह बिष्ट को नोडल अधिकारी बनाया गया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1962 में हुई स्टडी के दौरान मजदूरों में काम करने की क्षमता में ह्रास हुआ है। साथ की पारिस्थितिक बदलाव भी आया है। अब देशभर में यह स्टडी दोबारा शुरू की गई है। इसका उद्देश्य दिहाड़ी का सही आकलन करने के साथ विभिन्न प्रदेशों में दिहाड़ी की असमानताओं को समाप्त करना है। इस शोध के लिए ग्राम्य विकास विभाग ने आईआईटी रुड़की, पंतनगर यूनिवर्सिटी और एनआईटी श्रीनगर से प्रस्ताव मांगा है। आईआईटी ने इस काम के लिए 66 लाख रुपये का प्रस्ताव बनाकर भेजा है। हालांकि केंद्र की ओर से शोध के लिए 25 लाख की स्वीकृति दी है। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।   

भौगोलिक चुनौतियों के आधार पर इन श्रेणियों में तय होंगे मानक       
पूर्ण रूप से पर्वतीय क्षेत्र, जहां औसत से अधिक बर्फबारी होती है। (जिला चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी)      
आंशिक/मिश्रित पर्वतीय क्षेत्र, जहां बर्फबारी होती है। (जिला अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल, पौड़ी एवं टिहरी)      
पूर्ण रूप से मैदानी क्षेत्र (जिला हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर)      

विभागों में भी समान नहीं है मजदूरों की दिहाड़ी       
- राज्य स्तर पर तो मजदूरों के अलग-अलग दिहाड़ी मिल ही रही है। साथ ही एक ही राज्य के विभिन्न विभागों में भी दिहाड़ी की असमानताएं हैं। जैसे उत्तराखंड में ही मनरेगा की दिहाड़ी 175 रुपये है, जबकि कृषि विभाग में यह दिहाड़ी 199 रुपये प्रतिदिन निर्धारित की गई है। वहीं लोक निर्माण विभाग में दिहाड़ी की दर 260 रुपये है।
    
अक्षम लोगों को भारी काम से मिलेगी छूट 
- शोध के आकलन पर यह भी तय किया जाएगा कि जो मजदूर शारीरिक रूप से भारी काम करने में सक्षम नहीं है। उन्हें निर्माण की साइट पर हलके काम जैसे पानी पिलाना, साइट पर मजदूरों के बच्चों की देखभाल करना, चौकीदारों करना आदि काम दिए जाएंगे।       
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उत्तराखंड शासन की ओर से टाइम एंड मोशन स्टडी के लिए प्रस्ताव मांगा गया था। जिसका संस्थान के विभागों से विचार विमर्श के बाद 66 लाख रुपये का प्रस्ताव बनाकर ग्राम्य विकास विभाग को भेज दिया है।       
- जितेंद्र डिमरी, असिस्टेंट रजिस्ट्रार आईआईटी रुड़की

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