आज भी वो भयानक रात जब आंखों के सामने आती है तो नींद में भी दौड़ पड़ता हूं। यह देख घरवाले मुझे बार-बार दरवाजे से वापस लाते हैं। यह कहना है गौरीकुंड निवासी रामचंद्र का, जिनका आपदा में सब कुछ बह गया और अब तक ना मुआवजा मिल पाया ना कोई काम।
रामचंद्र का कहना है कि 16-17 जून 2013 की आपदा को चाहकर भी नहीं भूल सकता हूं। कारण कि अपना 22 कमरों का लॉज और रेस्तरां सब कुछ इस आपदा में खो दिया। खुद भी रातभर लोगों की चीख-पुकार के बीच जैसे-तैसे जान बचाई। रामचंद्र ने बताया कि उस रात मैं गौरीकुंड गांव में था, इसलिए बच गया। मुझे नहीं लग रहा था कि मैं भी बच पाऊंगा।
पूरी रात घबराहट के साथ मौत को सोचते हुए जागकर बिताई। अगले दिन सुबह जंगल का खतरनाक रास्ता पकड़ लिया और चलता गया। सोच लिया कि मुझे जीना है। तीन दिन बाद जंगल से बाहर कहीं निकला और कुछ लोग दिखाई दिए तो जान में जान आई। सबसे पहले खाने की तलाश में जुट गया।
खाने के लिए मारामारी मची थी। लोग एक दूसरे का निवाला छीनने को आतुर थे। जैसे तैसे दिन गुजरे। कुछ दिन बाद वापस अपने लॉज और रेस्तरां को देखने निकल गया, लेकिन वहां तो कुछ था ही नहीं। यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही जगह है, जहां हम अपनी रोजी-रोटी चलाते थे। सदमे में कई दिनों तक रात में उठकर भागने लगता था।
हां अब यह समझ में आ गया कि दोबारा से हमें अपने लिए रोजगार ढूंढना है। धर्मपुर के सरस्वती विहार में रहने वाले गंगाराम उनियाल का भी गौरीकुंड में 20 कमरों का लॉज था पर आज वो भी अपने लिए रोजगार की तलाश कर रहे हैं। मुआवजा ना मिल पाने से भी व्यापारियों में रोष है।
पति ने दे दी थी जान, पत्नी को जाना पड़ा गांव
गौरीकुंड में आपदा से हुए नुकसान के बाद डिप्रेशन में आए व्यापारी ओम प्रकाश उनियाल ने खुद तो जहर खा लिया, लेकिन परिवार पर आफत टूट पड़ी।
ओम प्रकाश की पत्नी अपने दोनों बच्चों संग दून में रहती थी, ताकि उन्हें बेहतर भविष्य दे सके, लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। आपदा में हुए नुकसान के बाद आर्थिक तंगी की वजह से वापस गांव जाना पड़ा।
कहां से लाएं बिल
आपदा में अपना सब कुछ खो देने वाले लोग अब मुआवजे के लिए कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। स्थिति यह है कि पीड़ितों से आपदा में हुए नुकसान से संबंधित सामानों का बिल मांगा जा रहा है। परेशान लोगों का कहना है कि आपदा में सब कुछ खोने के बाद अब वह सामानों का बिल कहां से लाएं।
आपदा में क्षतिग्रस्त हुईं थीं 2892 पेयजल योजनाएं
वर्ष-2013 में आई आपदा से राज्य में 2892 पेयजल योजनाएं क्षतिग्रस्त हो गईं थीं। इनमें से 2344 की मरम्मत हो गई और 548 योजनाओं पर अब भी काम चल रहा है। इन सभी योजनाओं के मरम्मतीकरण के लिए अलग-अलग फंड से 98 करोड़ रुपए पेयजल विभागों को दिए जा चुके हैं।
मालूम हो कि दो वर्ष पूर्व आई आपदा में चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, टिहरी, बागेश्वर, चंपावत आदि पहाड़ी क्षेत्रों की पेयजल योजनाएं ना सिर्फ क्षतिग्रस्त हो गईं, बल्कि कई योजनाएं तो पूरी बह गईं थीं। जल संस्थान के मुख्य महाप्रबंधक एसके गुप्ता ने बताया कि योजनाओं की मरम्मत के लिए 50 करोड़ रुपए विश्व बैंक से मिले।
इसके अलावा राज्य सरकार, मुख्यमंत्री राहत कोष, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वच्छता मिशन से भी बजट मिला। उन्होंने बताया कि जिन योजनाओं पर काम चल रहा है, उन योजनाओं से भी लोगों को पानी दिया जा रहा है।