तीर्थयात्रियों को केदारनाथ धाम तक पहुंचने वाले घोड़ों और खच्चरों का मल-मूत्र अब मंदाकिनी नदी को मैला नहीं करेगा। इससे अब बिजली, रसोई गैस और खाद तैयार की जाएगी। इसके लिए यात्रा के मुख्य पड़ाव गौरीकुंड में बायोगैस प्लांट और कंपोस्ट पिट स्थापित किए जाएंगे। इससे 15 घरों को बिजली और रसोई गैस मुहैया हो पाएगी।
गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए केंद्र सरकार की नमामि गंगे परियोजना के तहत गौरीकुंड में बायोगैस प्लांट लगाया जाएगा। इसमें घोड़े और खच्चरों के मल-मूत्र से बायोगैस तैयार की जाएगी और इससे 48 से 50 किलोवाट बिजली का उत्पादन होगा।
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यह बिजली 15 घरों को सप्लाई की जाएगी। साथ ही इससे बाजार व पैदल मार्ग पर स्ट्रीट लाइटें भी रोशन होंगी। यही नहीं, बायोगैस से 58 से 60 मीटर क्यूबिक रसोई गैस तैयार की जाएगी।
केदारनाथ यात्रा में आपदा के बाद 2014 से 2019 तक प्रतिवर्ष घोड़ा-खच्चरों के संचालन में वृद्धि हुई है। दो वर्ष पूर्व यात्रा में सात हजार घोड़ा-खच्चरों का संचालन हुआ था। इनके मल-मूत्र से पूरे पैदल मार्ग पर गंदगी रहती है, जो बारिश में सीधे मंदाकिनी नदी में बह जाती है। इसलिए, अब इसका उपयोग बिजली, रसोई गैस व खाद बनाने में किया जाएगा। इसके लिए प्रयोग के तौर पर गौरीकुंड में मिनी बायोगैस प्लांट स्थापित किया जाएगा।
परियोजना से जुड़े अधिकारियों ने दो दिन पूर्व गौरीकुंड में बायोगैंस प्लांट के लिए भूमि का निरीक्षण किया है। अधिकारियों के अनुसार बायोगैस प्लांट के लिए केंद्र सरकार से 34 लाख 59 हजार रुपये की धनराशि स्वीकृत हो जा चुकी है।