बाबा केदारधाम के आस्था पथ पर पहला कदम 6 बजे सुबह गुप्तकाशी में पंजीकरण के साथ रखा। पिछले साल की आपदा की स्मृति थोड़ी चिंता में डाले थी।
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साथ में नादेह (गुजरात) से आए पांच यात्रियों का जत्था था। लगभग 15 मिनट में रजिस्ट्रेशन की औपचारिकता पूरी हुई। गुप्तकाशी से हल्के वाहनों को आगे जाने की इजाजत है। हम मैक्स में सवार हुए।
सोन प्रयाग पहुंचे तो पता चला कि वाहन आगे नहीं जाएंगे। पार्किंग वहीं है, हालांकि उसके आगे साढ़े तीन किमी तक हल्के वाहनों के चलने लायक रास्ता बना दिया गया है।
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सोनप्रयाग में हमारे पंजीकरण के कागजातों की जांच की गई। बताया गया था कि मेडिकल भी होगा लेकिन वहां इसकी कोई व्यवस्था नहीं थी।
बाबा की डोली आगे, पीछे-पीछे हम
पुराने रूट से सोनप्रयाग से गौरीकुंड तक लगभग छह किमी का रास्ता पैदल चलने लायक ठीक-ठाक बना लिया गया है। रास्ते पर चलते हुए आश्वस्ति का भाव जगा।
हम यात्रियों को यह जानकर बड़ी खुशी हुई जब लोगों ने बताया कि हमारे ठीक आगे-आगे बाबा केदार की डोली चल रही है।
बाबा की डोली अपने शीतकालीन प्रवास ऊखीमठ से अपने धाम की ओर बढ़ रही थी। याद दिलाते चलें बाबा की डोली को बीती आपदा के बाद से ही केदारधाम से ऊखीमठ ले जाया गया था।
गौरीकुंड से रामबाड़ा की दूरी लगभग 7 किमी है। यहां लगभग चार फीट चौड़ी सड़क बना ली गई है जो पहाड़ी मानकों के लिहाज से बुरी नहीं है। गौरीकुंड में चाय-पानी की व्यवस्था है।
उसके बाद हम आगे बढ़े तो साढ़े तीन किमी पैदल चलकर जंगल चट्टी पहुंचे तो वहां सरकार की ओर से निशुल्क खाने की व्यवस्था है।
खाने-पीने के लिए केवल इसी का सहारा है क्योंकि रास्ते में फिलहाल अभी कोई दुकान नहीं है। जंगल चट्टी से भीमबली की दूरी लगभग चार किमी है। वहां मंदाकिनी पर एक छोटा पुल बनाया गया है।
अभी भी दिखता है आपदा का निशान
मंदाकिनी अब शांत भाव से बह रही है। लेकिन पिछले साल इसके रौद्र रूप से सभी सहम गए थे। यहां से रामबाड़ा की सीमा शुरू हो जाती है। मंदाकिनी द्वारा मचाए गए तबाही के मंजर यहां साफ नजर आते हैं। रामबाड़ा के बाद पुराना रास्ता गायब है।
नदी पर बनाए नये पुल को पार करने बाद लगभग छह फुट का नया रास्ता बनाया गया है। दाहिनी ओर नवनिर्माण के दृश्य हैं तो बायीं ओर आपदा में विध्वंस के नजारे हैं। पूरी तरह से तबाह हुए रामबाड़ा का मंजर दिल को कचोट जाता है।
छोटी लिनचोली से साढ़े तीन किमी की खड़ी चढ़ाई पर बड़ी लिनचोली है। रास्ते में कई हिमनद हैं। दो-तीन स्थानों पर काटकर इनके बीच से रास्ता बनाया गया है। बड़ी लिनचोली में निःशुल्क भोजन की अच्छी व्यवस्था है। हमें ताजा दाल-चावल खाने को मिले। इससे चढ़ाई का श्रम थोड़ा कम हुआ।
धाम के चारों तरफ बर्फ का साम्राज्य
बड़ी लिनचोली से दो किमी की और खड़ी चढ़ाई के बाद केदारनाथ का बेसकैंप है। यहां से बाबा केदार के दर्शन होने लगते हैं। चारों ओर बर्फ का साम्राज्य पसरा है। सामने बीती आपदा में आश्चर्यजनक रूप से सही-सलामत बची गरुण चट्टी के दीदार होते हैं।
केदारधाम में हल्की चहल-पहल है। हल्के शोर के साथ बह रही मंदाकिनी बेहद शांत लगती है। यकीन नहीं आता कि उसने बीते साल इतनी बड़ी तबाही मचाई होगी।
बर्फ की श्वेत चादर ने अपने तौर पर बहुत कुछ ढंकने का प्रयास किया है, लेकिन उससे तबाही के निशान झांकते जरूर हैं।
तीर्थ पुजारी बताते हैं कि हमसे थोड़ी देर पहले बाबा केदार की डोली धाम में पहुंच गई है। इसे भंडार गृह में रखा गया है।
रविवार को यह अपने मूल स्थान पर विराजमान होगी। मंगलवार को आरती होगी। केदारनाथ धाम की साज-सज्जा भव्य तरीके से की गई है।
विध्वंस के साथ निर्माण जगाता है भरोसा
नादेह, गुजरात से आए सहयात्रियों में से दो इससे पहले भी धाम आ चुके थे। बताते हैं रामबाड़ा तो पूरी तरह तबाह है। सोन प्रयाग से केदारधाम तक हर ओर तबाही के निशान पसरे हैं।
बड़ी-बड़ी खिसकी चट्टानें, टूटे मकान और दुकानें, तबाह होटल-रेस्त्रां, बिखरे टीन-टप्पर हर ओर नजर आते हैं। बड़ी लिन्चौली के बाद बहुत सारी बर्बादी बर्फ में ढकी दिखती है।
केदारनाथ धाम में झांकते तबाही के दृश्य हृदय विदारक हैं। लेकिन ध्वंस के साथ निर्माण की प्रक्रिया सभी स्थानों पर दिख रही है। जगह-जगह टूटी सड़कों की मरम्मत में जुटे लोग आस्था इतनी प्रबल है कि वह बार-बार धाम में आना चाहते हैं।
केदारनाथ धाम में मौसम भी आस्थावानों के साथ है। हल्के बादल जरूर थे, लेकिन उनसे बारिश की संभावना नहीं थी।
सबसे बड़ी बात यह कि बाबा के धाम में कपाट खुलने से पहले ही लगभग 600 लोग विद्यमान हैं। बेशक इनमें कुछ काम करने वाले हैं लेकिन यह संख्या अनुमान से लगभग दोगुनी है।
इनके लिए धाम में टेंट और खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था की गई है। इससे ज्यादा यात्री बढ़ेंगे तो दिक्कतें हो सकती हैं।