पहाड़ में नियुक्ति के बावजूद कैंप कार्यालयों की आड़ में मैदानी क्षेत्रों में डटे रहने वाले उत्तराखंड के अफसरों पर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद एक बार फिर यह मुद्दा सरगर्म है।
हकीकत पहाड़ के लिए है भी कड़वी। जिम्मेदार अफसर कई दिनों तक पहाड़ स्थित मुख्यालय नहीं पहुंचते। देहरादून स्थित कैंप कार्यालय में डटे रहते हैं। अविभाजित यूपी में गढ़वाल के मंडलीय अफसर नियमित रूप से पौड़ी स्थित मुख्यालयों से ही कामकाज निस्तारित करते थे।
लेकिन राज्य बनने के बाद जिम्मेदार अफसर पहाड़ से दूरी बनाते चले गए। सरकारें भी आंखें बंद किए रहीं। कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार भी गंभीर हुई है। मुख्यमंत्री सुगम में डटे अधिकारियों को बोरिया-बांध लेने की हिदायत दे रहे हैं।
यह है कमिश्नर, डीआईजी व मुख्य वन संरक्षक जैसे अफसरों का हाल।
कमिश्नर गढ़वाल : पौड़ी एक अरसे से कमिश्नरी मुख्यालय है। लेकिन राज्य बनने के बाद कैंप आफिस के बहाने कमिश्नर पौड़ी से देहरादून शिफ्ट हो गए। रेवेन्यू कोर्ट भी देहरादून में ही लगने लगी।
अफसरों ने मूल स्थान छोड़कर दून को चुन लिया। सरकार ने भी ध्यान नहीं दिया। पूर्णकालिक कमिश्नर देने के नाम पर हाथ खड़े कर दिए। हर कमिश्नर के पास शासन का भी चार्ज रहा। इसी बहाने वह पौड़ी से मुंह फेरे रहे।
चंद्र सिंह नपलच्याल तो एक साल से कमिश्नर हैं, हालांकि कमिश्नर बनने की इनकी पात्रता जनवरी 2015 में पूरी होगी। इन्हें शासन में भाषा व जनगणना जैसे महकमे देकर एक कमरा सचिवालय में भी दिया गया है।
इसी बहाने ये देहरादून में रहते हैं। नपलच्याल अक्तूबर में पौड़ी में मात्र चार दिन बैठे और उनके मुख्यालय जाने की अंतिम तिथि 22 अक्तूबर थी।